Updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Ch 9: डायरी का एक पन्ना
Welcome, students! Are you ready to dive into a powerful chapter from India's history? This guide provides updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) Chapter 9, 'डायरी का एक पन्ना'. We've included detailed answers, important board exam questions, and easy explanations to help you score full marks.
This chapter, 'डायरी का एक पन्ना' (A Page from a Diary), is a real-life account of India's fight for freedom. It’s crucial for your CBSE board exams as it often features in question papers. Understanding this chapter helps you connect with our history and develop strong answer-writing skills.
Chapter at a Glance
Chapter 9: डायरी का एक पन्ना – Quick Reference
| Chapter Name | डायरी का एक पन्ना (Diary ka Ek Panna) |
| Author | सीताराम सेकसरिया (Sitaram Seksaria) |
| Subject | Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) |
| Board / Class | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Key Topics | 26 जनवरी 1931 का दिन, कलकत्ता में स्वतंत्रता दिवस, लोगों का उत्साह, पुलिस का दमन |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 4–6 Marks |
Learning Objectives
Understand the historical significance of 26th January before India's independence.
Analyze Sitaram Seksaria's diary entry as a historical document.
Describe the patriotic zeal of Indians, including women, during the freedom struggle.
Explain the events that took place in Calcutta (now Kolkata) on January 26, 1931.
Answer all Important Questions from this chapter for your Board Exam 2026-27.
Key Concepts, Dates, and Terms
2. कौंसिल का नोटिस (Council's Notice) — A notice by the 'सर्व भारतीय प्रतिनिधि सभा' challenging the British by calling people for the gathering. Represented Indian defiance.
Extra MCQs – Practice & Self-Test
Full NCERT Solutions – All Exercise Questions
कलकत्ता वासियों के लिए 26 जनवरी 1931 का दिन इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि एक साल पहले 26 जनवरी 1930 को पूरे भारत में पहला स्वतंत्रता दिवस मनाया गया था। इस साल वे इसकी वर्षगाँठ मना रहे थे और देश का दूसरा स्वतंत्रता दिवस मनाने की तैयारी कर रहे थे।
सुभाष बाबू के जुलूस का पूरा भार और प्रबंधन की जिम्मेदारी पूर्णोदास पर थी।
विद्यार्थी संघ के मंत्री अविनाश बाबू ने जैसे ही तारा सुंदरी पार्क में झंडा गाड़ा, पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया और उनके साथ के अन्य लोगों को भी गिरफ्तार कर लिया।
सुभाष बाबू को चौरंगी पर पकड़ लिया गया और पुलिस ने उन पर लाठियाँ बरसाईं।
26 जनवरी 1931 के दिन को अमर बनाने के लिए कलकत्ता में व्यापक तैयारियाँ की गईं। लोगों ने अपने घरों और दफ्तरों पर तिरंगा फहराया। शहर के लगभग सभी मकानों पर राष्ट्रीय झंडा लगा था और कई मकानों को तो ऐसे सजाया गया था मानो स्वतंत्रता ही मिल गई हो।
आज का दिन निराला था क्योंकि पुलिस के कड़े पहरे और कमिश्नर के नोटिस के बावजूद, लोगों ने बड़ी संख्या में जुलूस और सभाओं में भाग लिया। प्रचार में ₹2000 खर्च किए गए थे और कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को प्रोत्साहित कर रहे थे। यह उत्साह और निडरता ही इस दिन को निराला बना रही थी।
पुलिस कमिश्नर का नोटिस सभाओं और जुलूसों को गैरकानूनी घोषित करता था और लोगों को इसमें भाग लेने से रोकता था। इसके विपरीत, कौंसिल का नोटिस लोगों को ठीक 4:24 पर मोनुमेंट के नीचे झंडा फहराने और प्रतिज्ञा पढ़ने के लिए आमंत्रित करता था, जो सीधे तौर पर ब्रिटिश शासन को एक खुली चुनौती थी।
धर्मतल्ले के मोड़ पर पुलिस ने जुलूस को रोकने के लिए लाठीचार्ज कर दिया। इस लाठीचार्ज के कारण भीड़ तितर-बितर हो गई और कई लोग घायल हो गए। सुभाष बाबू को भी यहीं पर पकड़ लिया गया, जिससे जुलूस टूट गया।
डॉ. दासगुप्ता जुलूस में घायल हुए लोगों की देखभाल और उनकी तस्वीरें खींच रहे थे। उनकी भूमिका घायलों को प्राथमिक चिकित्सा देने और ब्रिटिश पुलिस की क्रूरता के सबूत इकट्ठा करने की थी। बाद में उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया।
सुभाष बाबू के जुलूस में स्त्री समाज ने अभूतपूर्व भूमिका निभाई। महिलाएँ बड़ी संख्या में जुलूस में शामिल हुईं। जानकीदेवी और मदालसा बजाज जैसी प्रमुख महिलाएँ भी मौजूद थीं। मोनुमेंट के पास से ही स्त्रियों ने एक अलग जुलूस निकाला और अपनी गिरफ्तारी दी। उन्होंने सीढ़ियों पर चढ़कर झंडा फहराने का प्रयास भी किया। उनकी निडरता और सक्रिय भागीदारी ने आंदोलन को और भी सशक्त बना दिया।
जब जुलूस लालबाजार आया तो लोगों की दशा बहुत खराब हो गई। पुलिस ने उन्हें बेरहमी से पीटा। बहुत से लोग घायल हुए, कई के सिर फट गए। स्त्रियों के दल को गिरफ्तार कर लिया गया। लेखक के अनुसार, लगभग 105 महिलाएँ गिरफ्तार हुईं और कई लोगों को लॉकअप में बंद कर दिया गया। यह सब देखकर ऐसा लग रहा था मानो अंग्रेजी शासन ने अपनी पूरी ताकत प्रदर्शनकारियों को कुचलने में लगा दी हो।
यहाँ ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाए गए उस कानून को भंग करने की बात हो रही है जिसके तहत किसी भी प्रकार की सभा या जुलूस पर पाबंदी थी। यह कानून भारतीयों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करता था।
पाठ के संदर्भ में, इस कानून को भंग करना पूरी तरह से उचित था। यह 'ओपन लड़ाई' इसलिए थी क्योंकि भारतीय निडर होकर अपनी आज़ादी का हक़ माँग रहे थे। गुलामी की बेड़ियों को तोड़ने और अपने देश को स्वतंत्र कराने के लिए ऐसे अन्यायपूर्ण कानूनों का शांतिपूर्ण विरोध करना देशभक्तों का कर्तव्य था।
आशय: इस पंक्ति का आशय है कि 26 जनवरी 1931 को कलकत्ता में जो हुआ, वह अभूतपूर्व था। पहले यह माना जाता था कि बंगाल या कलकत्ता में स्वतंत्रता आंदोलन को लेकर उतना जोश और काम नहीं हो रहा है। लेकिन इस दिन, पुलिस के कड़े प्रतिबंधों के बावजूद, जिस तरह हज़ारों लोगों ने, विशेषकर महिलाओं ने, निडर होकर प्रदर्शन किया, उसने इस कलंक को धो दिया। इस दिन ने साबित कर दिया कि कलकत्ता भी स्वतंत्रता संग्राम में किसी से पीछे नहीं है।
आशय: इस पंक्ति का आशय है कि कौंसिल द्वारा पुलिस कमिश्नर के नोटिस के जवाब में सभा करने का नोटिस निकालना एक सीधी और खुली चुनौती थी। पहले के प्रदर्शनों में शायद इतनी स्पष्ट और सीधी टक्कर ब्रिटिश शासन से नहीं ली गई थी। कौंसिल ने समय और स्थान बताकर सभा की घोषणा की, जो यह दर्शाता था कि भारतीय अब डरने वाले नहीं हैं और वे अपने अधिकारों के लिए खुलकर लड़ेंगे, भले ही परिणाम कुछ भी हो।
Extra Important Questions (Board Style 2026-27)
बड़ाबाजार के मकानों पर राष्ट्रीय झंडा फहराना ब्रिटिश शासन के खिलाफ एक मूक लेकिन शक्तिशाली विरोध था। यह दर्शाता था कि कलकत्ता के आम नागरिक और व्यापारी भी दिल से स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थन करते हैं और वे अपनी राष्ट्रीय पहचान को गर्व से प्रदर्शित करने से नहीं डरते।
पुलिस की बर्बरता के बावजूद लोग मैदान में डटे रहे क्योंकि उनके दिलों में देशभक्ति की ज्वाला जल रही थी। वे अपने देश को आज़ाद कराने के लिए किसी भी तरह का बलिदान देने को तैयार थे। सुभाष बाबू जैसे नेताओं की उपस्थिति ने उनके जोश को और भी बढ़ा दिया था।
- इतने कड़े सरकारी प्रतिबंधों के बावजूद अभूतपूर्व संख्या में लोगों ने प्रदर्शन में भाग लिया।
- महिलाओं ने पहली बार इतनी बड़ी संख्या में और इतने जोश के साथ जुलूसों में भाग लेकर अपनी गिरफ्तारी दी थी।
इस कथन से लेखक का तात्पर्य है कि यह सभा ब्रिटिश सरकार के लिए एक खुली चुनौती थी। क्रांतिकारियों ने छिपकर नहीं, बल्कि पहले से घोषणा करके, समय और स्थान बताकर सभा का आयोजन किया था। यह सीधे-सीधे ब्रिटिश सत्ता को यह संदेश देना था कि भारतीय अब डरने वाले नहीं हैं।
घायल लोगों की तस्वीरें ब्रिटिश पुलिस की क्रूरता और अत्याचार को दुनिया के सामने लाने के लिए एक सबूत के तौर पर खींची जा रही थीं। इससे यह साबित किया जा सकता था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों पर किस तरह का अमानवीय व्यवहार किया गया।
'डायरी का एक पन्ना' पाठ हमें सिखाता है कि सच्ची देशप्रेम की भावना किसी भी डर या दमन से बड़ी होती है। कलकत्ता के निवासियों ने धर्म, जाति और लिंग के भेद को भुलाकर एकजुटता का परिचय दिया। पुरुषों, महिलाओं, छात्रों और आम नागरिकों, सभी ने मिलकर आजादी के लिए संघर्ष किया। यह घटना हमें प्रेरणा देती है कि राष्ट्र के लिए एकजुट होकर बड़े से बड़े संकट का सामना किया जा सकता है और व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर देशहित में बलिदान देना ही सर्वोच्च कर्तव्य है।
पाठ के आधार पर यह स्पष्ट है कि स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी। उस ज़माने में जब महिलाएँ आमतौर पर घर की चारदीवारी तक सीमित रहती थीं, उन्होंने जुलूसों में भाग लिया, झंडा फहराने का प्रयास किया और निडर होकर गिरफ्तारियाँ दीं। उनकी भागीदारी ने आंदोलन को एक नई शक्ति और व्यापकता प्रदान की। इसने समाज के हर वर्ग को यह संदेश दिया कि आज़ादी की लड़ाई सबकी है। उनकी हिम्मत देखकर पुरुषों का भी मनोबल बढ़ा। अतः उनकी भूमिका केवल प्रतीकात्मक नहीं, बल्कि निर्णायक थी।
यदि मैं कोलकाता में उस ऐतिहासिक मोनुमेंट (शहीद मीनार) के पास खड़ा होऊँ, तो मेरा मन गर्व और कृतज्ञता के भाव से भर जाएगा। मैं उन हजारों अनाम नायकों और नायिकाओं को याद करूँगा जिन्होंने इसी धरती पर लाठियाँ खाईं, लहू बहाया और अपनी आज़ादी के सपने के लिए बलिदान दिया। सीताराम सेकसरिया की डायरी के शब्द मेरी आँखों के सामने जीवंत हो उठेंगे। मुझे एहसास होगा कि जिस आज़ादी की हवा में हम साँस ले रहे हैं, वह कितने संघर्षों और बलिदानों का परिणाम है। यह स्थान मेरे लिए केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक प्रेरणा-तीर्थ बन जाएगा।
सीताराम सेकसरिया की डायरी लेखन शैली की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- तथ्यात्मक और सजीव वर्णन: वे घटनाओं का ज्यों का त्यों, बिना किसी लाग-लपेट के वर्णन करते हैं। समय, स्थान, लोगों के नाम और आँकड़ों (जैसे ₹2000 का खर्च, 105 स्त्रियाँ गिरफ्तार) का सटीक उल्लेख उनके लेखन को एक विश्वसनीय ऐतिहासिक दस्तावेज़ बनाता है।
- भावनात्मक गहराई: तथ्यात्मक होने के साथ-साथ उनका लेखन भावनाओं से भी ओत-प्रोत है। वे लोगों के जोश, उत्साह, पीड़ा और गर्व को अपने शब्दों में सफलतापूर्वक व्यक्त करते हैं, जिससे पाठक सीधे उस घटना से जुड़ जाता है।
इस 'कलंक' से लेखक का आशय उस आम धारणा से था कि बंगाल और विशेषकर कलकत्ता के लोग स्वतंत्रता संग्राम में उतनी सक्रियता और जोश नहीं दिखा रहे हैं, जितनी देश के अन्य भागों में दिख रही है। यह कलंक 26 जनवरी 1931 के सफल और विशाल प्रदर्शन से धुला। इस दिन, पुलिस की तमाम पाबंदियों और चेतावनियों को धता बताते हुए, हज़ारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। उन्होंने जुलूस निकाले, सभा की और लाठीचार्ज का सामना किया। महिलाओं की अभूतपूर्व भागीदारी ने इस प्रदर्शन को और भी शक्तिशाली बना दिया। इस व्यापक जन-भागीदारी ने साबित कर दिया कि बंगाल का राष्ट्रप्रेम किसी से कम नहीं है।
Common Mistakes Students Make
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master डायरी का एक पन्ना 🇮🇳
'डायरी का एक पन्ना' is more than just a chapter; it's a window into the soul of our freedom struggle. By understanding these NCERT Solutions for Class 10 Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) Chapter 9, you are not just preparing for your exams but also paying tribute to our heroes. Revise these questions, practice writing the answers, and you'll be well-prepared to ace your Hindi exam. Keep up the great work!
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