पर्वत प्रदेश में पावस: Updated NCERT Solutions & Important Questions for Class 10 Hindi (2026-27)
Explore the magic of 'Parvat Pradesh Mein Pavas' by Sumitranandan Pant. This detailed guide provides complete NCERT solutions, important questions, and simple explanations. Mastering this beautiful poem is crucial for scoring high marks in your CBSE Class 10 Hindi board exams. Let's begin our journey!
Chapter Overview: पर्वत प्रदेश में पावस
Chapter 4: पर्वत प्रदेश में पावस – Quick Reference
| Chapter Name | पर्वत प्रदेश में पावस (Chapter 4) |
| Author | सुमित्रानंदन पंत (Sumitranandan Pant) |
| Subject | Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) |
| Class / Board | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | भावार्थ (Poem Explanation), मानवीकरण अलंकार (Personification), प्रकृति का सजीव चित्रण (Live depiction of nature), कठिन शब्दार्थ (Difficult word meanings). |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Key Imagery – कविता के मुख्य बिम्ब
Learning Objectives
Understand the complete meaning (भावार्थ) of the poem 'Parvat Pradesh Mein Pavas'.
Explain the beautiful depiction of nature during the monsoon in the mountains.
Identify and explain the key literary device used: मानवीकरण अलंकार (Personification).
Analyze the poet's perspective and the magical atmosphere he creates.
Confidently answer all NCERT questions and extra board exam questions.
Appreciate the richness of Hindi poetry and the works of Sumitranandan Pant.
Key Concepts & Definitions
Updated NCERT Solutions for Sparsh Chapter 4
Here are the complete and easy-to-understand solutions for all the questions from your NCERT Sparsh (स्पर्श भाग 2) textbook.
पावस ऋतु में प्रकृति में पल-पल परिवर्तन आते हैं। कभी तेज़ बारिश होती है, तो कभी धूप निकल आती है। पर्वत, तालाब, और पेड़-पौधे सब पर इस बदलते मौसम का प्रभाव दिखाई देता है। चारों ओर धुंध छा जाती है और झरने बहने लगते हैं, जिससे प्रकृति का रूप हर क्षण नया लगता है।
'मेखलाकार' शब्द का अर्थ है 'करधनी के आकार का' (shaped like a waistband)। कवि ने इस शब्द का प्रयोग पर्वत श्रृंखला के लिए किया है क्योंकि पहाड़ियाँ घुमावदार और एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं, जो किसी कमर पर बंधी करधनी जैसी प्रतीत होती हैं।
'सहस्र दृग-सुमन' से तात्पर्य है 'हजारों पुष्प रूपी आँखें'। कवि ने इस पद का प्रयोग पर्वत पर खिले हुए अनगिनत फूलों के लिए किया है। कवि कल्पना करता है कि पर्वत इन फूलों रूपी आँखों से अपने विशाल रूप को नीचे तालाब में देख रहा है।
कवि ने तालाब की समानता एक विशाल दर्पण (mirror) के साथ दिखाई है। ऐसा इसलिए क्योंकि तालाब का पानी बिलकुल शांत और स्वच्छ है, जिसमें पर्वत अपनी हज़ारों पुष्प-रूपी आँखों के साथ अपना प्रतिबिंब स्पष्ट रूप से देख सकता है।
पर्वत के हृदय से उठकर ऊँचे-ऊँचे वृक्ष आकाश की ओर अपनी उच्चाकांक्षाओं (high ambitions) के कारण देख रहे थे। वे शांत आकाश को छूना चाहते हैं। यह इस बात को प्रतिबिंबित करता है कि मनुष्य के मन में भी हमेशा ऊँचा उठने और अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा होती है, ठीक उन पेड़ों की तरह।
जब मूसलाधार बारिश के कारण चारों ओर घना कोहरा और धुँआ छा जाता है, तो ऐसा लगता है मानो तालाब जल गया हो। इस भयानक और बदलते दृश्य को देखकर शाल के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष भयभीत होकर धरती में धँस गए प्रतीत होते हैं। यह प्रकृति के रौद्र रूप से डर जाने का एक काव्यात्मक चित्रण है।
झरने ऊँचे पर्वतों के गौरव का गान कर रहे हैं। वे पर्वतों की महानता और ऊँचाई के गीत गा रहे हैं। बहते हुए झरनों की तुलना मोतियों की चमकीली लड़ियों (sparkling strings of pearls) से की गई है, क्योंकि उनका सफ़ेद, झागदार पानी चट्टानों पर गिरते हुए मोतियों की माला जैसा सुंदर लगता है।
इस पंक्ति का भाव है कि मूसलाधार और घनी बारिश हो रही है, जिससे ऐसा लग रहा है मानो आकाश ही धरती पर टूट पड़ा हो। चारों तरफ पानी ही पानी है और बारिश की तेज़ धार के कारण आकाश और धरती का अंतर मिट गया है। यह वर्षा की भयंकरता और तीव्रता को दर्शाता है।
इस पंक्ति का भाव है कि पर्वतीय प्रदेश में वर्षा के कारण मौसम में तेज़ी से अद्भुत परिवर्तन हो रहे हैं। कभी धूप, कभी बारिश, और कभी घना कोहरा छा जाता है। इस जादुई और मायावी बदलाव को देखकर कवि को ऐसा लगता है कि वर्षा के देवता इंद्र बादलों रूपी विमान में घूम-घूम कर अपना जादुई खेल (इंद्रजाल) दिखा रहे हैं।
भाव यह है कि पहाड़ पर उगे ऊँचे-ऊँचे पेड़ ऐसे लग रहे हैं जैसे वे पर्वत के हृदय से उगी उसकी ऊँची आकांक्षाएँ हों। ये पेड़ एकदम शांत, स्थिर और एकटक होकर शांत आकाश की ओर देख रहे हैं। ऐसा लगता है कि वे अपनी ऊँची आकांक्षाओं को पूरा न कर पाने की चिंता में डूबे हुए हैं और आकाश को छूने का कोई उपाय सोच रहे हैं।
Extra Important Questions (Board Exam 2026-27)
कवि को पर्वत पर खिले हजारों फूल पर्वत की आँखों (सहस्र दृग-सुमन) जैसे लग रहे हैं। कवि कल्पना करता है कि पर्वत इन फूलों रूपी आँखों से नीचे फैले विशाल तालाब रूपी दर्पण में अपनी विशालता को निहार रहा है।
मूसलाधार बारिश के कारण चारों ओर घना कोहरा छा गया था। इस कोहरे में ऊँचे-ऊँचे शाल के पेड़ दिखाई नहीं दे रहे थे, वे अदृश्य हो गए थे। इस दृश्य को देखकर ऐसा लग रहा था मानो वे प्रकृति के इस बदलते रूप से डरकर धरती के अंदर धँस गए हों।
'पल-पल परिवर्तित प्रकृति-वेश' का आशय है कि पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु के समय प्रकृति का रूप हर क्षण बदल रहा है। कभी धूप निकलती है, तो अगले ही पल बादल छा जाते हैं और मूसलाधार बारिश होने लगती है। यह तीव्र परिवर्तन एक नाटक के बदलते दृश्यों जैसा लगता है।
झरने की 'झर-झर' आवाज़ को सुनकर कवि कल्पना करता है कि झरने अपनी इस ध्वनि से पर्वतों की महानता और गौरव का गुणगान कर रहे हैं। उनकी ध्वनि नस-नस में उत्साह और प्रसन्नता भर देती है।
कवि ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि अचानक घने बादल और कोहरा छा जाने के कारण विशाल पर्वत आँखों से ओझल हो गया। वह दिखाई देना बंद हो गया, मानो कोई विशाल पक्षी की तरह अपने पंख फड़फड़ाकर उड़ गया हो। यह प्रकृति के जादुई और अप्रत्याशित बदलाव को दर्शाता है।
'पर्वत प्रदेश में पावस' सुमित्रानंदन पंत द्वारा रचित प्रकृति के सौंदर्य की एक अद्भुत कविता है।
- सजीव चित्रण: कवि ने शब्दों के माध्यम से पर्वतीय प्रदेश में वर्षा ऋतु का एक सजीव और गतिशील चित्र खींचा है। पर्वत, झरने, तालाब, पेड़ और बादल सभी जीवंत प्रतीत होते हैं।
- मानवीकरण का प्रयोग: कविता का सबसे बड़ा सौंदर्य इसमें प्रयुक्त मानवीकरण अलंकार है। पर्वत को आँखों वाला, पेड़ों को चिंतित और महत्त्वाकांक्षी, और बादलों पर इंद्र को जादू करते हुए दिखाकर कवि ने निर्जीव प्रकृति में जान डाल दी है।
- ध्वनि और गति: 'झर-झर' झरनों की आवाज़ और 'पल-पल बदलते' प्रकृति के रूप से कविता में एक गति और संगीत का अनुभव होता है।
- रूपक और उपमा: तालाब को दर्पण और झरने को मोतियों की लड़ी बताकर कवि ने भाषा को अत्यंत सुंदर और प्रभावी बना दिया है।
संक्षेप में, यह कविता प्रकृति के कोमल, सुंदर और जादुई रूप का एक उत्कृष्ट उदाहरण है जो पाठक को मंत्रमुग्ध कर देती है।
कवि ने प्रकृति के अनेक रूपों का चित्रण किया है।
वर्षा से पहले का दृश्य:
- पर्वत अपनी करधनी जैसी श्रृंखला के साथ खड़ा है।
- उस पर खिले फूल उसकी आँखें हैं।
- पर्वत के नीचे एक विशाल तालाब है जो दर्पण का काम कर रहा है।
- ऊँचे-ऊँचे वृक्ष शांत आकाश को देख रहे हैं।
- पहाड़ों से गिरते झरने मोतियों की लड़ियों जैसे लग रहे हैं।
वर्षा के दौरान का दृश्य:
- अचानक घने बादल छा जाते हैं और पर्वत अदृश्य हो जाता है।
- केवल झरनों की आवाज़ सुनाई देती है, फूल छिप जाते हैं।
- मूसलाधार वर्षा होती है, मानो आकाश धरती पर टूट पड़ा हो।
- चारों ओर कोहरा और धुँआ सा छा जाता है, जिससे शाल के पेड़ भी छिपे हुए और डरे हुए लगते हैं।
- यह पूरा दृश्य इंद्र का रचा हुआ कोई जादू (इंद्रजाल) लगता है।
इस प्रकार, कवि ने प्रकृति के शांत, सुंदर और फिर अचानक रौद्र व मायावी, दोनों रूपों का अद्भुत चित्रण किया है।
पेड़ों को 'उच्चाकांक्षाओं से तरुवर' कहकर कवि हमें जीवन में हमेशा ऊँचे लक्ष्य रखने की प्रेरणा देते हैं। जिस प्रकार पेड़ बिना हिले-डुले, शांत भाव से आकाश को छूने की आकांक्षा रखते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने जीवन में बड़े सपने देखने चाहिए और उन्हें पूरा करने के लिए धैर्य और स्थिरता के साथ प्रयास करना चाहिए। यह हमें सिखाता है कि महत्त्वाकांक्षी होना एक स्वाभाविक और सकारात्मक गुण है, बशर्ते हम उसे प्राप्त करने के लिए सही मार्ग पर चलें।
इस कविता को 'चित्रमयी' कविता इसलिए कहा जाता है क्योंकि कवि सुमित्रानंदन पंत अपने शब्दों से पाठक के मन में एक सजीव चित्र बना देते हैं। कविता को पढ़ते हुए ऐसा लगता है मानो सब कुछ हमारी आँखों के सामने घटित हो रहा हो।
- उदाहरण 1: "मेखलाकार पर्वत अपार, अपने सहस्र दृग-सुमन फाड़"। इन पंक्तियों को पढ़ते ही आँखों के सामने करधनी के आकार का पहाड़ और उस पर खिले हज़ारों फूल आ जाते हैं।
- उदाहरण 2: "गिरिवर के उर से उठ-उठ कर... झाँक रहे नीरव नभ पर"। इसे पढ़कर लंबे-लंबे पेड़ जो आकाश की ओर देख रहे हैं, उनका चित्र मन में बन जाता है।
कवि की शब्द-चयन की यही शक्ति इस कविता को एक चित्रमयी कविता बनाती है।
कवि की इस कल्पना का गहरा आशय है। यह केवल एक काव्यात्मक वर्णन नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के शक्तिशाली और अप्रत्याशित रूप को दर्शाता है। इसका आशय यह है कि प्रकृति जब अपना रूप बदलती है, तो बड़ी से बड़ी और मज़बूत चीज़ें भी उसके सामने तुच्छ और असहाय लगने लगती हैं। ऊँचे और अटल दिखने वाले शाल के पेड़ भी प्रकृति के कोप (घने कोहरे और बारिश) के सामने डरकर छिप जाते हैं। यह मनुष्य को यह संदेश भी देता है कि उसे प्रकृति की शक्ति का सम्मान करना चाहिए।
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Frequently Asked Questions (FAQs)
Master पर्वत प्रदेश में पावस 🌧
'Parvat Pradesh Mein Pavas' is not just a chapter; it's a beautiful journey into the heart of nature. We hope this detailed guide helps you master it completely. Revise regularly, practice writing, and you'll be set for your exams!
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