Updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi मनुष्यता (Chapter 3)
Welcome, students! This guide provides detailed Updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 3, "मनुष्यता" (Manushyata). This beautiful poem by Maithilisharan Gupt is crucial for your CBSE board exams. We will explore its deep meaning, important questions, and expert tips to help you score full marks.
Chapter at a Glance
Chapter 3: मनुष्यता – Quick Reference
| Chapter Name | मनुष्यता (Manushyata) |
| Poet | मैथिलीशरण गुप्त (Maithilisharan Gupt) |
| Subject | Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) |
| Board / Class | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | The true meaning of humanity, selflessness, universal brotherhood, qualities of a generous person. |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Learning Objectives
Understand the central theme and message of the poem "मनुष्यता".
Explain the meaning of difficult words and poetic lines.
Identify the qualities of a true human being as described by the poet.
Analyze the historical and mythological examples used in the poem.
Write clear and concise answers for your CBSE Board Exam Questions 2026.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions – स्पर्श (भाग 2)
कवि मैथिलीशरण गुप्त के अनुसार, सुमृत्यु वह मृत्यु है जिसे लोग उसके अच्छे कर्मों और परोपकार के लिए याद करते हैं। जो व्यक्ति दूसरों की भलाई करते हुए मरता है, उसकी मृत्यु व्यर्थ नहीं जाती और वह मरने के बाद भी लोगों के दिलों में जीवित रहता है। ऐसी गौरवशाली मृत्यु को ही कवि ने 'सुमृत्यु' कहा है।
उदार व्यक्ति की पहचान उसके निःस्वार्थ भाव और विश्व-बंधुत्व की भावना से होती है। वह किसी से भेदभाव नहीं करता और पूरी दुनिया को अपना परिवार समझता है। उसकी उदारता और महानता की चर्चा पुस्तकों और इतिहास में भी होती है और सारा संसार उसकी पूजा करता है।
कवि ने दधीचि, कर्ण, रंतिदेव और राजा शिबि जैसे महान व्यक्तियों का उदाहरण देकर यह संदेश दिया है कि सच्ची मनुष्यता त्याग और बलिदान में है। इन सभी ने दूसरों की भलाई के लिए अपनी सबसे कीमती वस्तुएँ, यहाँ तक कि अपने प्राण भी दान कर दिए। हमें भी उन्हीं की तरह परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।
कवि ने निम्नलिखित पंक्तियों में गर्व-रहित जीवन व्यतीत करने की बात कही है:
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हमें कभी भी धन-संपत्ति के घमंड में अंधा नहीं होना चाहिए और न ही इस बात पर गर्व करना चाहिए कि हमारे पास सहारे के लिए अपने लोग हैं।
'मनुष्य मात्र बंधु है' का अर्थ है कि दुनिया के सभी मनुष्य आपस में भाई-बहन हैं। हमारा सबसे बड़ा संबंध मानवता का है। हम सभी एक ही ईश्वर की संतान हैं, इसलिए हमारे बीच जाति, धर्म, रंग या देश के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए। हमें सभी के साथ प्रेम और एकता का व्यवहार करना चाहिए।
कवि ने सबको एक होकर चलने की प्रेरणा इसलिए दी है क्योंकि एकता में ही शक्ति है और इसी से हम अपने लक्ष्यों को प्राप्त कर सकते हैं। जब हम सब मिलकर एक-दूसरे का सहारा बनकर आगे बढ़ेंगे, तो हमारे रास्ते की सभी बाधाएँ अपने आप दूर हो जाएँगी। इससे आपसी भेदभाव मिटेगा और समाज का कल्याण होगा।
इस कविता के अनुसार, व्यक्ति को परोपकारी, उदार, त्यागी और विनम्र जीवन व्यतीत करना चाहिए। उसे केवल अपने लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए भी जीना चाहिए। उसे धन-दौलत का घमंड नहीं करना चाहिए और सभी मनुष्यों को अपना बंधु समझना चाहिए। ऐसा जीवन ही सार्थक और पूजनीय होता है।
'मनुष्यता' कविता के माध्यम से कवि यह संदेश देना चाहता है कि सच्चा मनुष्य वही है जो मानवता के लिए जीता और मरता है। हमें स्वार्थ को त्यागकर परोपकार, उदारता, करुणा, त्याग और विश्व-बंधुत्व जैसे मानवीय गुणों को अपनाना चाहिए। यही सच्ची मनुष्यता है और इसी से हमारा जीवन सफल हो सकता है।
पंक्तियाँ:
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरुद्धवाद बुद्ध का दया-प्रवाह में बहा,
विनीत लोकवर्ग क्या न सामने झुका रहा?
भाव: इन पंक्तियों का भाव यह है कि सहानुभूति और करुणा मनुष्य का सबसे बड़ा धन है। जिसके पास यह गुण होता है, वह पूरी दुनिया को अपने वश में कर सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा बुद्ध हैं। जब उन्होंने करुणा का संदेश दिया, तो उनके विरोधी भी उनके सामने झुक गए और उनके अनुयायी बन गए। इसलिए, हमें भी सभी प्राणियों के प्रति सहानुभूति रखनी चाहिए।
पंक्तियाँ:
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में,
सनाथ जान आपको करो न गर्व चित्त में।
अनाथ कौन है यहाँ? त्रिलोकनाथ साथ हैं,
दयालु दीनबंधु के बड़े विशाल हाथ हैं।
भाव: इन पंक्तियों में कवि मनुष्य को संदेश देते हैं कि उसे कभी भी थोड़े से धन-वैभव पर घमंड नहीं करना चाहिए। उसे यह सोचकर भी अहंकार नहीं करना चाहिए कि उसके पास परिवार और रक्षक हैं। इस दुनिया में कोई भी अनाथ नहीं है, क्योंकि तीनों लोकों के स्वामी ईश्वर सबके साथ हैं। वह दयालु प्रभु अपनी कृपा सब पर बनाए रखता है।
पंक्तियाँ:
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए,
विपत्ति, विघ्न जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेलमेल हाँ, बढ़े न भिन्नता कभी,
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
भाव: इन पंक्तियों का भाव यह है कि हमें अपने इच्छित मार्ग पर खुशी-खुशी आगे बढ़ना चाहिए। रास्ते में आने वाली मुसीबतों और बाधाओं का हिम्मत से सामना करना चाहिए। कवि यह भी सलाह देते हैं कि हमारा आपसी प्रेम-भाव कभी कम नहीं होना चाहिए और हमारे बीच मतभेद नहीं बढ़ना चाहिए। हमें तर्क-वितर्क से परे होकर, एकता के साथ एक ही रास्ते पर सावधानी से चलना चाहिए ताकि हम सब मिलकर प्रगति कर सकें।
Extra Board Exam Questions (2026-27)
कवि ने 'सनाथ' होने पर गर्व न करने की सलाह इसलिए दी है क्योंकि यह घमंड का प्रतीक है। असल में, दुनिया में कोई भी अनाथ नहीं है क्योंकि सबके रक्षक स्वयं ईश्वर हैं। सांसारिक सहारे अस्थायी होते हैं, जबकि ईश्वर का सहारा स्थायी है।
'विश्व-बंधुत्व' का अर्थ है पूरे विश्व को एक परिवार मानना। कविता में कवि कहते हैं "मनुष्य मात्र बंधु है," जिसका मतलब है कि सभी मनुष्य एक ही ईश्वर की संतान हैं और आपस में भाई हैं। हमें जाति, धर्म और देश से ऊपर उठकर एक-दूसरे से प्रेम करना चाहिए।
इस पंक्ति का आशय है कि हम सभी बिना किसी तर्क-वितर्क या मतभेद के, एकता के साथ एक ही कल्याणकारी मार्ग पर सावधानी से चलें। हमारा लक्ष्य एक हो और हम सब मिलकर उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयास करें, जिससे समाज में एकता बनी रहे।
'मनुष्यता' कविता का केंद्रीय भाव मानवता, परोपकार और विश्व-बंधुत्व का संदेश देना है। राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं कि मनुष्य का जन्म लेना ही बड़ी बात नहीं है, बल्कि उसके कर्म उसे महान बनाते हैं। सच्चा मनुष्य वही है जो स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरों की भलाई के लिए जीता है। केवल अपने लिए जीना तो पशुओं का स्वभाव है। कवि हमें दधीचि, कर्ण, रंतिदेव जैसे महान पुरुषों से प्रेरणा लेने को कहते हैं, जिन्होंने परोपकार के लिए अपना सब कुछ बलिदान कर दिया। कविता यह संदेश देती है कि हमें धन-दौलत का घमंड नहीं करना चाहिए और सभी मनुष्यों को अपना भाई समझना चाहिए। अंत में, कवि एकता के साथ, एक-दूसरे का सहारा बनकर प्रगति के पथ पर चलने की प्रेरणा देते हैं। यही मानवता का मूल तत्व है और इसी से जीवन सार्थक होता है।
कवि ने 'मनुष्यता' के संदेश को प्रभावी बनाने के लिए कई पौराणिक उदाहरण दिए हैं, जो त्याग के महत्व को दर्शाते हैं:
- महर्षि दधीचि: उन्होंने देवताओं की रक्षा के लिए वृत्रासुर नामक राक्षस का वध करने हेतु अपनी हड्डियाँ तक दान कर दी थीं। यह परोपकार के लिए देह-त्याग का सर्वोच्च उदाहरण है।
- राजा शिबि: उन्होंने एक कबूतर की जान बचाने के लिए अपने शरीर का मांस काटकर बाज को दे दिया था। यह जीव-दया के लिए आत्म-बलिदान को दर्शाता है।
- राजा रंतिदेव: उन्होंने भूख से व्याकुल होते हुए भी अपने हिस्से का भोजन एक भूखे व्यक्ति को दे दिया था। यह निःस्वार्थ सेवा का प्रतीक है।
- कर्ण: उन्होंने अपने वचन की रक्षा के लिए अपने प्राण-रक्षक कवच और कुंडल इंद्र को दान कर दिए थे।
इन उदाहरणों से कवि यह स्पष्ट करते हैं कि सच्ची मनुष्यता त्याग और बलिदान की नींव पर ही टिकी है। जब हम दूसरों के लिए कुछ त्याग करते हैं, तभी हम स्वार्थ की सीमाओं से ऊपर उठकर सच्चे अर्थों में मनुष्य बनते हैं।
'मनुष्यता' कविता में मैथिलीशरण गुप्त द्वारा दिए गए आदर्श आज के स्वार्थी और भौतिकवादी समाज में पहले से भी कहीं अधिक प्रासंगिक हैं।
- प्रासंगिकता: आज जहाँ लोग धन, पद और प्रसिद्धि के पीछे भाग रहे हैं, वहीं यह कविता हमें याद दिलाती है कि असली धन सहानुभूति और परोपकार है। कोरोना महामारी के समय हमने देखा कि कैसे डॉक्टरों, स्वास्थ्यकर्मियों और आम लोगों ने अपनी जान की परवाह किए बिना दूसरों की मदद की - यह 'मनुष्यता' का साक्षात उदाहरण था। वहीं दूसरी ओर, हम सड़क पर पड़े घायल व्यक्ति को अनदेखा कर आगे बढ़ जाने वाली भीड़ भी देखते हैं, जो 'पशु-प्रवृत्ति' को दर्शाती है।
- निष्कर्ष: कविता के आदर्श जैसे 'वसुधैव कुटुंबकम्' (पूरी पृथ्वी ही परिवार है) और निःस्वार्थ सेवा आज की सामाजिक समस्याओं जैसे अकेलापन, भेदभाव और घृणा का एकमात्र समाधान है। यदि हम इस कविता के संदेश को अपने जीवन में उतारें, तो एक बेहतर और करुणामय समाज का निर्माण कर सकते हैं।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master मनुष्यता 🌍
The poem "मनुष्यता" is not just a chapter in your syllabus; it's a lesson for life. Its message of kindness, unity, and selflessness is timeless. We hope these NCERT Solutions and extra questions will help you master this chapter. All the best for your exams!
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