Updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 1 साखी: Important Questions (2026-27)
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Chapter at a Glance
Chapter 1: साखी – Quick Reference
| Chapter Name | साखी (Sakhi) |
| Author | कबीर (Kabir) |
| Subject | Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) |
| Board / Class | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | मीठी वाणी का महत्व, गुरु की महिमा, ईश्वर का स्वरूप, निंदा का महत्व |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Learning Objectives
Understand the meaning and significance of Kabir's 'Sakhis' (couplets).
Explain the importance of sweet speech and humility.
Describe the role of a 'Guru' (teacher) in one's life.
Analyze Kabir's views on God, love, and knowledge.
Appreciate the simple yet powerful language used by Kabir.
Confidently answer CBSE Class 10 Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) Chapter 1 questions in your exams.
Key Concepts & Definitions
Extra MCQs – Practice & Self-Test
Explanation: कबीर कहते हैं "निंदक नेड़ा राखिये, आँगणि कुटी बँधाइ," जिसका अर्थ है निंदक को आँगन में कुटिया बनाकर पास रखना चाहिए।
Explanation: यहाँ 'बिरह' (वियोग) को 'भुवंगम' (साँप) का रूप दिया गया है, इसलिए यह रूपक अलंकार है।
Explanation: साखी "पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुवा..." के अनुसार, प्रेम का मर्म जानने वाला ही सच्चा पंडित है।
Explanation: 'सोना' अज्ञान का और 'जागना' ज्ञान की प्राप्ति का प्रतीक है।
Explanation: हिरण अपनी ही नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध से अनजान होकर उसे पूरे वन में खोजता है।
Full Updated NCERT Solutions for Class 10 Hindi Sparsh Chapter 1
कबीरदास जी के अनुसार, जब हम मीठी वाणी या विनम्र शब्दों का प्रयोग करते हैं, तो सुनने वाले के मन से क्रोध और घृणा जैसे भाव समाप्त हो जाते हैं। उसे सुख और शांति का अनुभव होता है। जब हमारी वाणी दूसरों को प्रसन्न करती है, तो उसके प्रत्युत्तर में वे भी हमसे मीठे शब्द ही कहते हैं। इससे हमें भी प्रसन्नता होती है और हमारा अपना मन भी शांत और शीतल हो जाता है। इस प्रकार, मीठी वाणी बोलने वाले और सुनने वाले दोनों के लिए सुखदायी होती है।
साखी के संदर्भ में, 'दीपक' ज्ञान का प्रतीक है और 'अँधियारा' अज्ञान और अहंकार का प्रतीक है। कबीरदास जी कहते हैं कि जिस प्रकार एक दीपक के जलते ही सारा अंधकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार जब व्यक्ति को गुरु के माध्यम से ईश्वरीय ज्ञान रूपी दीपक की प्राप्ति होती है, तो उसके मन में बसा अज्ञान, संदेह और अहंकार रूपी अंधकार पूरी तरह से नष्ट हो जाता है। उसका हृदय निर्मल और पवित्र हो जाता है।
कबीरदास जी के अनुसार, ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, ठीक वैसे ही जैसे हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है। पर हम उसे इसलिए नहीं देख पाते क्योंकि हमारे मन में 'मैं' अर्थात् अहंकार का वास होता है। हम ईश्वर को मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थ स्थानों में खोजते रहते हैं, जबकि वह हमारे भीतर ही मौजूद है। जब तक हमारा अहंकार समाप्त नहीं होता और हम आत्मज्ञान प्राप्त नहीं करते, तब तक हम सर्वव्यापी ईश्वर को देख नहीं पाते।
कबीरदास जी के अनुसार, संसार में वे लोग सुखी हैं जो केवल खाने-पीने और भोग-विलास में लिप्त हैं और संसार की नश्वरता से अनजान हैं। इसके विपरीत, दुखी वह व्यक्ति है जिसे ज्ञान प्राप्त हो गया है और वह ईश्वर को पाने के लिए तड़प रहा है।
यहाँ 'सोना' सांसारिक सुखों में डूबे रहने और अज्ञान का प्रतीक है, जबकि 'जागना' ज्ञान प्राप्त होने और ईश्वर से वियोग की पीड़ा में जागते रहने का प्रतीक है।
अपने स्वभाव को निर्मल अर्थात् पवित्र और दोष रहित रखने के लिए कबीर ने अपनी निंदा करने वाले व्यक्ति (निंदक) को अपने पास रखने का उपाय सुझाया है। कबीरदास जी कहते हैं कि हमें अपने आलोचक को आँगन में कुटिया बनाकर सम्मानपूर्वक रखना चाहिए। वह बिना साबुन और पानी के हमारी कमियाँ बताकर हमारे स्वभाव को शुद्ध और निर्मल कर देता है।
इस पंक्ति के द्वारा कवि यह कहना चाहता है कि मोटी-मोटी किताबें या शास्त्र पढ़कर कोई भी सच्चा ज्ञानी या पंडित नहीं बन सकता। सच्चा ज्ञानी या पंडित तो वह है जिसने 'प्रेम' या 'ईश्वर' रूपी एक अक्षर का वास्तविक अर्थ समझ लिया हो और उसे अपने जीवन में उतार लिया हो। ईश्वर-प्रेम ही एकमात्र सत्य है और इसे जान लेने वाला ही वास्तविक पंडित है।
कबीर की साखियों की भाषा की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सधुक्कड़ी भाषा: इनकी भाषा को 'सधुक्कड़ी' कहा जाता है क्योंकि इसमें अवधी, ब्रज, राजस्थानी, पंजाबी और खड़ी बोली जैसे कई भाषाओं के शब्द मिले हुए हैं।
- जनभाषा: कबीर ने आम बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया है, जिससे उनके उपदेश सीधे जनमानस तक पहुँचते हैं।
- भाव-प्रवणता: इनकी भाषा सीधे हृदय को छूती है और गूढ़ से गूढ़ बात को भी सरलता से समझा देती है।
- प्रतीकात्मकता: कबीर ने दीपक, अंधकार, मृग, कस्तूरी जैसे प्रतीकों का सुंदर प्रयोग करके अपनी बात को प्रभावशाली बनाया है।
- सरलता और सहजता: भाषा में कोई बनावटीपन नहीं है, वह अत्यंत सरल, सहज और प्रवाहपूर्ण है।
भावार्थ: इस पंक्ति का भाव यह है कि जब किसी व्यक्ति के शरीर में ईश्वर से बिछड़ने का वियोग रूपी साँप बस जाता है, तो उस पर किसी भी मंत्र या उपाय का कोई असर नहीं होता। वह ईश्वर-वियोग की पीड़ा में तड़पता रहता है। उस व्यक्ति का जीवन या तो ईश्वर से मिलकर संभव है, या फिर वह उस विरह की अग्नि में जलकर मर जाता है।
भावार्थ: इस पंक्ति का भाव यह है कि जिस प्रकार हिरण की नाभि में ही सुगंधित कस्तूरी होती है, परंतु वह उसकी सुगंध से अनभिज्ञ होकर उसे पूरे जंगल में खोजता फिरता है, ठीक उसी प्रकार ईश्वर भी प्रत्येक मनुष्य के हृदय में वास करता है, परंतु मनुष्य अज्ञानतावश उसे मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में ढूँढ़ता रहता है।
भावार्थ: इस पंक्ति का भाव यह है कि जब तक मेरे अंदर 'मैं' अर्थात् अहंकार था, तब तक मुझे ईश्वर की प्राप्ति नहीं हुई। और अब जब मुझे ईश्वर की प्राप्ति हो गई है, तो मेरा अहंकार पूरी तरह से नष्ट हो गया है। तात्पर्य यह है कि ईश्वर और अहंकार एक साथ नहीं रह सकते। ईश्वर को पाने के लिए अहंकार का त्याग करना अनिवार्य है।
भावार्थ: इस पंक्ति का भाव यह है कि संसार में लोग बड़े-बड़े ग्रंथ और शास्त्र पढ़-पढ़कर मर गए, किंतु कोई भी सच्चा ज्ञानी नहीं बन सका। कबीर के अनुसार, सच्चा ज्ञानी या पंडित वही है जिसने प्रेम के ढाई अक्षर का मर्म समझ लिया है। जिसने ईश्वर-प्रेम को जान लिया, वही परम ज्ञानी है।
Extra Important Questions (Board Exam 2026-27)
कबीर के अनुसार अहंकार ईश्वर प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा है। जब तक मनुष्य के मन में 'मैं' का भाव रहता है, तब तक उसे 'हरि' यानी ईश्वर नहीं मिल सकते। ईश्वर और अहंकार एक ही हृदय में एक साथ निवास नहीं कर सकते। इसलिए, आत्म-साक्षात्कार के लिए अहंकार को दूर करना आवश्यक है।
'साखी' शब्द 'साक्षी' का तद्भव रूप है, जिसका अर्थ है 'प्रत्यक्ष ज्ञान' या 'गवाह'। कबीर ने जो कुछ भी कहा, वह उनका स्वयं का अनुभव किया हुआ सत्य था। उन्होंने अपने प्रत्यक्ष ज्ञान को ही दोहों के रूप में प्रस्तुत किया, इसीलिए उनकी रचनाओं को 'साखी' कहा जाता है।
इस साखी के माध्यम से कबीर मधुर और विनम्र वाणी के प्रयोग का संदेश देना चाहते हैं। उनका मानना है कि ऐसी वाणी बोलनी चाहिए जो सुनने वाले को भी सुख दे और स्वयं के मन को भी शांति और शीतलता प्रदान करे। यह सामाजिक सद्भाव का मूल मंत्र है।
यह कहना पूर्णतः सत्य नहीं है कि कबीर केवल समाज सुधारक थे, संत नहीं। वास्तव में, वे एक महान संत थे जिनकी शिक्षाओं में समाज सुधार का गहरा पुट था। 'साखी' पाठ के आधार पर हम देख सकते हैं:
- संत के रूप में: वे ईश्वर-प्रेम, गुरु की महिमा, अहंकार-त्याग, और आत्मज्ञान की बात करते हैं, जो संत के प्रमुख लक्षण हैं। "जब मैं था तब हरि नहीं," "बिरह भुवंगम तन बसै," जैसी साखियाँ उनके गहरे आध्यात्मिक अनुभव को दर्शाती हैं।
- समाज सुधारक के रूप में: वे बाहरी आडंबरों ("पोथी पढ़ि पढ़ि..."), ऊँच-नीच, और दिखावे का खंडन करते हैं। मीठी वाणी बोलने का उपदेश ("ऐसी बाँणी बोलिये...") सामाजिक व्यवहार को सुधारने का संदेश देता है। निंदक को पास रखने की सलाह देना भी एक सामाजिक सुधार का ही दृष्टिकोण है।
अतः, कबीर एक ऐसे महान संत थे जिन्होंने अपनी आध्यात्मिक अनुभूति के माध्यम से समाज में व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार किया। उनके संतत्व और समाज सुधार के कार्य एक-दूसरे के पूरक हैं।
"कस्तूरी कुंडलि बसै, मृग ढूँढै बन माँहि। ऐसे घटि घटि राम हैं, दुनियाँ देखै नाँहि॥" इस साखी के माध्यम से कबीर बताते हैं कि मनुष्य जीवन में सबसे बड़ी भूल यह करता है कि वह सुख, शांति और ईश्वर को अपने बाहर खोजता है, जबकि वे सभी उसके भीतर ही विद्यमान हैं। जैसे हिरण अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी की सुगंध से मोहित होकर उसे पूरे जंगल में खोजता फिरता है, वैसे ही मनुष्य ईश्वर को मंदिरों, मस्जिदों और तीर्थों में खोजता है, जबकि ईश्वर तो कण-कण में, हर हृदय में व्याप्त है।
इस भूल को सुधारने का उपाय:
- आत्म-चिंतन: मनुष्य को बाहर भटकने के बजाय अपने भीतर झाँकना चाहिए।
- अहंकार का त्याग: अपने 'मैं' के भाव को त्यागकर ही आंतरिक सत्य को पहचाना जा सकता है।
- गुरु का मार्गदर्शन: एक सच्चे गुरु के मार्गदर्शन से ही आत्मज्ञान का मार्ग प्रशस्त होता है और मनुष्य इस भूल को सुधार सकता है।
कबीर की यह साखी आज के आधुनिक संदर्भ में भी पूरी तरह प्रासंगिक है।
- समानता: जैसे कुम्हार घड़े को सुंदर और उपयोगी बनाने के लिए बाहर से थपथपा कर चोट करता है और अंदर से हाथ का सहारा देता है, वैसे ही एक अच्छा शिक्षक भी छात्र की कमियों और गलतियों को दूर करने के लिए उसे अनुशासित करता है (बाहरी चोट) और साथ ही उसे प्रेम, प्रोत्साहन और सहारा भी देता है (आंतरिक सहार)।
- उद्देश्य: दोनों का उद्देश्य एक ही है - शिष्य या घड़े को एक बेहतर, मजबूत और सर्वांगीण स्वरूप प्रदान करना। शिक्षक की डाँट या अनुशासन का उद्देश्य छात्र को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि उसके भविष्य को उज्ज्वल बनाना होता है।
- आधुनिक प्रासंगिकता: आज की प्रतिस्पर्धी दुनिया में, शिक्षकों का यह कर्तव्य और भी बढ़ जाता है। उन्हें छात्रों को न केवल किताबी ज्ञान देना होता है, बल्कि उन्हें नैतिक मूल्य, अनुशासन और जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए भी तैयार करना पड़ता है। कबीर द्वारा बताया गया गुरु-शिष्य का यह आदर्श संबंध आज भी एक सफल शैक्षिक प्रणाली का आधार है।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master Kabir's Sakhis 🌍
Kabir's 'Sakhis' are timeless gems of wisdom. We hope these Updated NCERT Solutions, important questions, and tips help you master the CBSE Class 10 Hindi Course B – Sparsh (स्पर्श भाग 2) Chapter 1. Revise regularly, practice writing the answers, and you will surely excel in your Board Exam 2026-27. Keep learning!
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