NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7: छाया मत छूना
Welcome, students! This guide provides detailed NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 7, "छाया मत छूना". We will explore the poem's deep meaning and tackle important questions. Mastering this chapter is crucial for scoring well in your CBSE board exams and understanding life's philosophy.
Chapter at a Glance
Chapter 7: छाया मत छूना – Quick Reference
| Chapter Name | अध्याय 7 – छाया मत छूना (Chhaya Mat Chhoona) |
| Poet | गिरिजाकुमार माथुर (Girijakumar Mathur) |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Class / Board | Class 10 / CBSE |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | The pain of nostalgia, living in the present, the illusion of past glory (मृगतृष्णा), accepting harsh reality (यथार्थ). |
| Difficulty Level | Moderate (The philosophical theme requires careful understanding) |
| Exam Weightage | 3–5 Marks (Expect questions in extracts and short/long answer formats) |
मुख्य अवधारणाएँ – Key Ideas
Learning Objectives
Understand the central message of the poem "छाया मत छूना".
Explain the poet's advice to not dwell on past memories.
Define and use key terms like 'छाया', 'यथार्थ', 'दुना दुख', and 'मृगतृष्णा'.
Analyze the poetic devices and metaphors used by Girijakumar Mathur.
Confidently answer all NCERT exercise questions and important board exam questions.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 7
कवि गिरिजाकुमार माथुर ने कठिन यथार्थ के पूजन की बात इसलिए कही है क्योंकि यही जीवन का सत्य है।
- वर्तमान ही सत्य है: भूतकाल की सुखद यादें एक भ्रम की तरह होती हैं, जो हमें वर्तमान के दुखों से दूर नहीं ले जा सकतीं।
- यादें दुख बढ़ाती हैं: जब हम वर्तमान में दुखी होते हैं और अतीत के सुख को याद करते हैं, तो हमारा दुख कम होने की बजाय और भी बढ़ जाता है (दुना दुख)।
- भविष्य का निर्माण: यथार्थ को स्वीकार करके ही हम अपने वर्तमान को सुधार सकते हैं और एक बेहतर भविष्य की नींव रख सकते हैं। यथार्थ से भागना कायरता है और उसका सामना करना ही बुद्धिमानी है।
इन पंक्तियों का भाव यह है:
- प्रभुता का शरण-बिंब केवल मृगतृष्णा है: इसका अर्थ है कि बड़प्पन, प्रसिद्धि और धन-दौलत का एहसास केवल एक छलावा (मृगतृष्णा) है। इंसान पूरी जिंदगी इनके पीछे भागता रहता है, लेकिन यह उसे कभी सच्ची संतुष्टि नहीं देते। यह वैसे ही है जैसे रेगिस्तान में प्यासा हिरण पानी की तलाश में चमकती रेत के पीछे भागता है।
- हर चंद्रिका में छिपी एक रात कृष्णा है: इसका अर्थ है कि जीवन में सुख और दुख का चक्र हमेशा चलता रहता है। हर चाँदनी रात (सुख) के पीछे एक काली रात (दुख) छिपी होती है। इसलिए, हमें सुख में बहुत अधिक उत्साहित और दुख में बहुत अधिक निराश नहीं होना चाहिए।
- 'छाया' का संदर्भ: कविता में 'छाया' शब्द अतीत की सुखद स्मृतियों, पुरानी यादों, और बीते हुए गौरवशाली पलों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ है। यह हमारे मन का एक भ्रम है, जो अब वास्तविक नहीं है।
- छूने से मना करने का कारण: कवि ने 'छाया' को छूने अर्थात् पुरानी यादों में खो जाने से इसलिए मना किया है क्योंकि:
- यह वर्तमान के दुख को दोगुना कर देता है।
- यह हमें यथार्थ का सामना करने से रोकता है और कमजोर बनाता है।
- बीते हुए सुख को याद करके वर्तमान का दुख और भी गहरा महसूस होता है। इसलिए, कवि वर्तमान में जीने की सलाह देते हैं।
कविता में विशेषण के प्रयोग से आए अन्य उदाहरण निम्नलिखित हैं:
- दुना दुख: यहाँ 'दुना' विशेषण 'दुख' की तीव्रता को बढ़ा रहा है। यह सामान्य दुख नहीं, बल्कि दोगुना दुख है जो अतीत को याद करने से होता है।
- जीवित क्षण: यहाँ 'जीवित' विशेषण 'क्षण' को बहुत मूल्यवान बना रहा है। इसका अर्थ है वर्तमान का वह पल जिसमें हम जी रहे हैं, जो वास्तविक है।
- सुरंग-सुधियाँ: 'सुधियाँ' (यादें) के साथ 'सुरंग' (रंग-बिरंगी) विशेषण लगाने से यादों के सुंदर और मनमोहक होने का भाव प्रकट होता है।
- रस-बसंत: 'बसंत' के साथ 'रस' विशेषण लगाने से जीवन के सुखद और आनंदमय समय का चित्र उभरता है।
- एक रात कृष्णा: यहाँ 'कृष्णा' (काली) विशेषण 'रात' के अंधकार, दुख और निराशा को दर्शाता है।
- 'मृगतृष्णा' का शाब्दिक अर्थ: रेगिस्तान में गर्मी के कारण रेत पर पानी होने का जो भ्रम पैदा होता है, उसे मृगतृष्णा कहते हैं। प्यासा हिरण उसे पानी समझकर उसके पीछे भागता है, पर उसे पानी कभी नहीं मिलता।
- कविता में प्रयोग: कविता में 'मृगतृष्णा' का प्रयोग धन, मान, सम्मान, और बड़प्पन (प्रभुता) के पीछे भागने के अर्थ में हुआ है। कवि कहते हैं कि इंसान इन चीजों के पीछे भागकर भी कभी संतुष्ट नहीं हो पाता, यह सब एक छलावा मात्र है।
यह भाव कविता की निम्नलिखित पंक्ति में स्पष्ट रूप से झलकता है:
"जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण।"
इस पंक्ति का अर्थ है कि जो तुम्हें जीवन में नहीं मिल सका, उसे भूल जाओ और अपने आने वाले कल (भविष्य) को बेहतर बनाने का प्रयास करो। यह पंक्ति अतीत को भूलकर वर्तमान में जीते हुए भविष्य को संवारने की प्रेरणा देती है।
कविता के अनुसार मनुष्य के दुखों के मुख्य कारण निम्नलिखित हैं:
- अतीत की यादें: अपने अतीत के सुखद पलों को याद करना वर्तमान के दुख को और बढ़ा देता है।
- प्रभुता की चाह: मान-सम्मान, धन और बड़प्पन के पीछे भागना भी दुख का कारण है क्योंकि यह एक मृगतृष्णा है जो कभी पूरी नहीं होती।
- यथार्थ को स्वीकार न करना: वर्तमान की कठिन सच्चाइयों से मुँह मोड़ना और कल्पनाओं में जीना दुख को बढ़ाता है।
- सही समय पर सही अवसर न मिलना: कविता में कहा गया है, "समय पर मिल न सकी, दुखी है मन"। इसका अर्थ है कि जब मनचाही वस्तु समय पर नहीं मिलती तो मन दुखी हो जाता है।
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उत्तर: 'दुना दुख' का अर्थ है दुख का दोगुना हो जाना। कवि के अनुसार, यह तब होता है जब व्यक्ति अपने वर्तमान के दुखों से परेशान होकर अतीत के सुखद पलों को याद करने लगता है। अतीत का सुख और वर्तमान का दुख मिलकर उसके कष्ट को और भी बढ़ा देते हैं।
उत्तर: कवि ने ऐसा इसलिए कहा है क्योंकि वर्तमान की कठोर सच्चाई ही जीवन का वास्तविक सत्य है। अतीत की यादों में जीने से कोई लाभ नहीं होता। हमें वर्तमान की चुनौतियों का डटकर सामना करना चाहिए ताकि हम अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सकें। यथार्थ को स्वीकार करना ही साहस है।
उत्तर: कविता में 'शरद-रात' (चाँदनी रात) और 'बसंत' दोनों ही जीवन के सुखद, सुंदर और आनंदमय समय के प्रतीक हैं। ये उन खुशियों भरे पलों को दर्शाते हैं जो बीत चुके हैं और अब केवल यादों के रूप में शेष हैं।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि यदि सही समय पर सफलता या खुशी नहीं मिली, तो उसके लिए दुखी नहीं होना चाहिए। यदि जीवन रूपी बसंत बीत जाने पर भी फूल (सफलता) नहीं खिला, तो भी उसकी यादों की सुगंध हमारे साथ रहती है। हमें उसी के सहारे आगे बढ़ना चाहिए, न कि उस पर शोक मनाना चाहिए।
उत्तर: कविता के अनुसार, मनुष्य की दुविधा का मुख्य कारण यह है कि उसका मन अतीत की सुखद यादों और वर्तमान की कठोर सच्चाई के बीच फँसा हुआ है। वह न तो अतीत को पूरी तरह भुला पाता है और न ही वर्तमान को पूरी तरह अपना पाता है। इसी कश्मकश में उसका दुख बढ़ता जाता है।
उत्तर: 'छाया मत छूना' शीर्षक कविता के मूल भाव को पूरी तरह से व्यक्त करता है। यह शीर्षक अत्यंत सार्थक और सटीक है।
- प्रतीकात्मक अर्थ: यहाँ 'छाया' का अर्थ बीती हुई सुखद यादें हैं। 'छूना' का अर्थ है उन यादों में खो जाना। कवि सलाह देते हैं कि हमें इन यादों में नहीं डूबना चाहिए।
- दुख का कारण: कवि स्पष्ट करते हैं कि इन छायाओं को छूने से मन का दुख दोगुना हो जाता है। यह हमें वर्तमान की सच्चाइयों से दूर ले जाकर कमजोर बनाता है।
- कविता का केंद्रीय संदेश: पूरी कविता इसी एक विचार के इर्द-गिर्द घूमती है कि अतीत से चिपके रहने की बजाय हमें वर्तमान की चुनौतियों को स्वीकार कर भविष्य की ओर देखना चाहिए। शीर्षक 'छाया मत छूना' एक चेतावनी और एक सलाह दोनों है, जो पाठक को जीवन जीने का सही मार्ग दिखाती है। अतः, यह शीर्षक कविता की आत्मा है।
उत्तर: कवि गिरिजाकुमार माथुर इस कविता के माध्यम से जीवन जीने का एक महत्वपूर्ण दार्शनिक संदेश देना चाहते हैं।
- वर्तमान में जिएं: सबसे प्रमुख संदेश यह है कि मनुष्य को अतीत की स्मृतियों में न उलझकर वर्तमान में जीना चाहिए। बीता हुआ कल वापस नहीं आ सकता।
- यथार्थ को स्वीकारें: जीवन की कठोर सच्चाइयों से भागना नहीं चाहिए, बल्कि साहसपूर्वक उनका सामना करना चाहिए।
- सुख-दुख को समान मानें: कवि बताते हैं कि सुख और दुख जीवन के दो पहलू हैं। हमें सुख में अधिक घमंड और दुख में अधिक निराशा नहीं करनी चाहिए।
- भौतिकता से दूर रहें: धन, दौलत, और यश के पीछे भागना एक मृगतृष्णा की तरह है। सच्ची खुशी भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि मानसिक शांति और संतुष्टि में है।
- भविष्य का निर्माण करें: जो जीवन में नहीं मिल पाया, उसका शोक मनाने की बजाय उसे भूलकर अपने भविष्य को संवारने का प्रयास करना चाहिए।
इस प्रकार, यह कविता हमें एक सकारात्मक और यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देती है।
छाया मत छूना,
मन, होगा दुख दूना।
जीवन में हैं सुरंग-सुधियाँ सुहावनी,
छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी;
तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी,
कुंतल के फूलों की याद बनी चाँदनी।
भूली-सी एक छुअन बनता हर जीवित क्षण-
छाया मत छूना,
मन, होगा दुख दूना।
प्रश्न (क): कवि किसे छूने से मना कर रहे हैं और क्यों?
उत्तर: कवि 'छाया' अर्थात अतीत की सुखद स्मृतियों को छूने (याद करने) से मना कर रहे हैं, क्योंकि ऐसा करने से वर्तमान का दुख दोगुना हो जाएगा।
प्रश्न (ख): 'सुरंग-सुधियाँ सुहावनी' का क्या आशय है?
उत्तर: इसका आशय है कि हमारे जीवन में अतीत की कई रंग-बिरंगी और मन को अच्छी लगने वाली यादें होती हैं।
प्रश्न (ग): 'बीत गई यामिनी' से क्या तात्पर्य है?
उत्तर: 'बीत गई यामिनी' का तात्पर्य है कि प्रिय के साथ बिताई गई चाँदनी रात (सुखद समय) अब बीत चुकी है और केवल उसकी यादें ही शेष हैं।
प्रश्न (घ): काव्यांश का मुख्य भाव क्या है?
उत्तर: काव्यांश का मुख्य भाव यह है कि हमें अतीत की सुखद यादों में खोकर अपने वर्तमान के दुख को और नहीं बढ़ाना चाहिए।
दुविधा-हत साहस है, दिखता है पंथ नहीं,
देह सुखी हो पर मन के दुख का अंत नहीं।
दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर,
क्या हुआ जो खिला फूल रस-बसंत जाने पर?
जो न मिला भूल उसे कर तू भविष्य वरण,
छाया मत छूना,
मन, होगा दुख दूना।
प्रश्न (क): 'दुविधा-हत साहस' का क्या अर्थ है?
उत्तर: इसका अर्थ है कि व्यक्ति का साहस दुविधाओं और असमंजस के कारण नष्ट हो गया है, उसे आगे का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है।
प्रश्न (ख): देह के सुखी होने पर भी मन क्यों दुखी है?
उत्तर: देह के सुखी होने पर भी मन इसलिए दुखी है क्योंकि वह अतीत और वर्तमान के बीच फँसा है। उसे मनचाही वस्तु समय पर नहीं मिली, जिसका दुख उसे सता रहा है।
प्रश्न (ग): कवि क्या भूलकर किसे अपनाने की बात कर रहे हैं?
उत्तर: कवि अतीत में जो कुछ नहीं मिल सका, उसे भूलकर वर्तमान को स्वीकार करते हुए भविष्य को अपनाने (भविष्य वरण) की बात कर रहे हैं।
प्रश्न (घ): 'दुख है न चाँद खिला शरद-रात आने पर' - पंक्ति का प्रतीकार्थ क्या है?
उत्तर: इसका प्रतीकार्थ है कि सही समय (शरद-रात) आने पर भी जब अपेक्षित खुशी (चाँद) नहीं मिलती, तो मन में दुख होता है।
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Master छाया मत छूना 🌍
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