NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6: यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल
Welcome, students! This guide provides complete NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 6, "यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल". You'll explore two beautiful poems by Nagarjun, breaking down their meanings and themes. Mastering this chapter is crucial for scoring well in your CBSE board exams. Let's begin!
Chapter at a Glance
Chapter 6: यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल – Quick Reference
| Chapter Name | यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल (Yeh Danturit Muskan evam Fasal) |
| Poet | नागार्जुन (Nagarjun) |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Class / Board | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Key Topics | The beauty and life-giving power of a child's smile. The collective effort and natural elements behind a crop. Symbolism and Imagery in poetry. Poet's emotional connection. |
| Difficulty Level | Easy to Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Learning Objectives
Explain the central idea (भावार्थ) of both poems, "यह दंतुरित मुस्कान" and "फसल".
Analyze the poetic devices (अलंकार) and imagery used by the poet Nagarjun.
Understand the deep emotional connection the poet feels with his child and with nature.
Describe the various natural and human elements that contribute to the creation of a crop.
Confidently answer all NCERT questions and other important questions for your board exams.
Key Concepts & Definitions
Extra MCQs – Practice & Self-Test
Full NCERT Solutions – यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल
बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर अत्यंत गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- मृतक में जान डालना: कवि को लगता है कि यह मुसकान इतनी जीवंत और प्रभावशाली है कि यह किसी मरे हुए व्यक्ति में भी प्राणों का संचार कर सकती है।
- कठोर हृदय को पिघलाना: कवि कहते हैं कि बच्चे की इस भोली मुसकान को देखकर पत्थर-दिल व्यक्ति भी पिघल सकता है, अर्थात् उसके मन में भी कोमलता और वात्सल्य का भाव जाग सकता है।
- कमल का खिलना: कवि को ऐसा प्रतीत होता है कि बच्चे का धूल से सना शरीर देखकर ऐसा लगता है मानो तालाब को छोड़कर कमल का फूल उनकी झोंपड़ी में खिल गया हो।
- बाँस और बबूल से शेफालिका का झरना: इस मुसकान के प्रभाव से कवि को कठोर और नीरस प्रकृति वाले बाँस और बबूल के पेड़ों से भी शेफालिका के कोमल फूल झड़ते हुए प्रतीत होते हैं।
संक्षेप में, बच्चे की मुसकान कवि के मन को प्रसन्नता, वात्सल्य और एक नई ऊर्जा से भर देती है।
बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में निम्नलिखित मुख्य अंतर हैं:
| बच्चे की मुसकान | बड़े व्यक्ति की मुसकान |
|---|---|
| निश्छल और स्वाभाविक: यह पूरी तरह से निश्छल, भोली और स्वाभाविक होती है। इसमें कोई स्वार्थ नहीं होता। | सोची-समझी और सप्रयोजन: यह अक्सर सोची-समझी और किसी उद्देश्य (स्वार्थ) से प्रेरित हो सकती है। |
| बिना किसी भेदभाव के: बच्चा अमीर-गरीब, अपने-पराए में भेद किए बिना सबको देखकर मुसकराता है। | विचारपूर्वक: बड़े व्यक्ति सोच-विचार कर, अवसर और व्यक्ति देखकर मुसकराते हैं। |
| हृदय से निकलती है: यह सीधे हृदय से निकलती है और देखने वाले के मन को मोह लेती है। | अक्सर औपचारिक होती है: यह कई बार केवल शिष्टाचार या औपचारिकता निभाने के लिए होती है। |
कवि नागार्जुन ने बच्चे की मुसकान के सौंदर्य को व्यक्त करने के लिए कई सुंदर बिंबों (images) का प्रयोग किया है:
- मृतक में भी जान डालने वाला बिंब: "मृतक में भी डाल देगी जान"।
- कमल के फूल का बिंब: "छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात"।
- पत्थर के पिघलने का बिंब: "पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण"।
- शेफालिका के फूलों का बिंब: "झरने लग पड़े शेफालिका के फूल"।
- अनिमेष देखने का बिंब: "देखते तुम इधर कनखी मार / और होतीं जब कि आँखें चार"।
ये सभी बिंब बच्चे की मुसकान की अलौकिक शक्ति, सुंदरता और पवित्रता को दर्शाते हैं।
(क) छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात।
(ख) छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल बाँस था कि बबूल? ▼
(क) भाव: इस पंक्ति का भाव यह है कि कवि को धूल-मिट्टी से सना हुआ अपना शिशु किसी तालाब में खिले कमल के फूल के समान सुंदर और पवित्र लग रहा है। उन्हें ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे वह कमल का फूल तालाब जैसी अपनी प्राकृतिक जगह को छोड़कर उनकी साधारण सी झोंपड़ी में आकर खिल गया है। यहाँ बच्चे को 'जलजात' (कमल) और उसकी झोंपड़ी को 'तालाब' के रूप में चित्रित किया गया है, जो बच्चे के सौंदर्य और आगमन की खुशी को दर्शाता है।
(ख) भाव: इस पंक्ति का भाव यह है कि बच्चे का स्पर्श इतना कोमल और जादुई है कि उसके छूने मात्र से कठोर और शुष्क चीजें भी सरस हो जाती हैं। कवि कहते हैं कि तुम्हारे स्पर्श से तो बाँस या बबूल जैसे काँटेदार और कठोर पेड़ों से भी शेफालिका के कोमल और सुगंधित फूल झरने लगते हैं। इसका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि बच्चे का प्रेम और उसकी मुसकान पाकर कठोर से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी भावुक और संवेदनशील बन जाता है।
कवि नागार्जुन के अनुसार, फसल किसी एक व्यक्ति या एक तत्व का परिणाम नहीं है, बल्कि यह अनेक प्राकृतिक और मानवीय तत्वों के सामूहिक योगदान का साकार रूप है। फसल है:
- नदियों के पानी का जादू: नदियों का पानी सिंचाई के लिए आवश्यक है।
- किसानों के हाथों के स्पर्श की महिमा: करोड़ों किसानों की मेहनत और परिश्रम का फल है।
- मिट्टी का गुण-धर्म: अलग-अलग प्रकार की मिट्टी (भूरी-काली-संदली) के पोषक तत्वों का परिणाम है।
- सूरज की किरणों का रूपांतर: सूर्य के प्रकाश से पौधे भोजन (प्रकाश संश्लेषण) बनाते हैं।
- हवा की थिरकन का संकोच: हवा भी फसल के बढ़ने में सहायक होती है।
अतः, फसल प्रकृति और मनुष्य के समन्वित प्रयास का एक जीवंत प्रतीक है।
कविता के अनुसार, फसल उपजाने के लिए निम्नलिखित आवश्यक तत्व हैं:
- पानी: नदियों का पवित्र जल।
- मनुष्य का श्रम: करोड़ों किसानों के हाथों का स्पर्श और उनकी मेहनत।
- मिट्टी: विभिन्न प्रकार की मिट्टियों के गुण-धर्म और पोषक तत्व।
- सूर्य का प्रकाश: सूरज की किरणें, जो पौधों को ऊर्जा देती हैं।
- हवा: मंद-मंद बहती हवा जो फसल को बढ़ने में मदद करती है।
‘फसल’ को ‘हाथों के स्पर्श की गरिमा’ और ‘महिमा’ कहकर कवि किसानों के अथक परिश्रम और श्रम के महत्व को व्यक्त करना चाहता है।
- गरिमा (Dignity): यह शब्द किसानों के श्रम को सम्मान और गौरव प्रदान करता है। कवि यह बताना चाहते हैं कि किसान का काम अत्यंत महत्वपूर्ण और सम्मानजनक है।
- महिमा (Glory): यह शब्द किसानों के श्रम के जादुई प्रभाव को दर्शाता है। यह वही महिमा है जो बीजों को अंकुरित कर उन्हें लहलहाती फसल में बदल देती है।
इस प्रकार, कवि यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि बिना किसान के कठोर परिश्रम के फसल का अस्तित्व संभव नहीं है। फसल वास्तव में किसानों की मेहनत का ही glorifying result है।
भाव: इन पंक्तियों का भाव यह है कि फसल के निर्माण में प्रकृति के दो महत्वपूर्ण तत्वों, सूर्य और हवा, का योगदान अद्वितीय है।
- रूपांतर है सूरज की किरणों का: इसका अर्थ है कि फसल और कुछ नहीं, बल्कि सूरज की किरणों का ही बदला हुआ रूप है। पौधे सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा को प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की क्रिया द्वारा भोजन में बदलते हैं, जिससे वे बढ़ते हैं और फल-अनाज पैदा करते हैं। इस प्रकार, जो ऊर्जा सूरज की किरणों में थी, वही अब फसल के रूप में रूपांतरित हो गई है।
- सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का: इसका अर्थ है कि फसल को बड़ा करने में हवा का भी योगदान है। हवा के धीमे-धीमे चलने (थिरकन) से पौधों को आवश्यक ऑक्सीजन और कार्बन-डाइऑक्साइड मिलती है और उनका विकास होता है। कवि ने यहाँ हवा के योगदान को 'सिमटा हुआ संकोच' कहकर बहुत सुंदर कल्पना की है, मानो हवा भी अपना योगदान देकर एक कोने में सिमट गई हो।
Extra Board Exam Questions (2026-27)
कवि अपने घुमक्कड़ स्वभाव और काम के कारण अक्सर घर से बाहर रहते हैं। वे अपने घर और परिवार के साथ लगातार नहीं रह पाते। इसी कारण, जब वे लंबे समय बाद घर लौटते हैं, तो उनका बच्चा भी उन्हें पहचान नहीं पाता। अपनी इसी स्थिति के कारण वे स्वयं को 'चिर प्रवासी' (long-term traveler/migrant) कहते हैं।
इसका आशय भारत के करोड़ों किसानों द्वारा किए गए कठोर परिश्रम से है। कवि कहना चाहते हैं कि फसल केवल प्राकृतिक तत्वों से नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों के पसीने, मेहनत और उनके हाथों के स्पर्श से पैदा होती है, जो फसल को एक गरिमा और महिमा प्रदान करता है।
बच्चे की मुसकान और कवि की मुलाकात का माध्यम बच्चे की माँ बनती है। चूँकि बच्चा कवि को पहचानता नहीं है, माँ ही उनका परिचय कराती है। कवि इस योगदान के लिए माँ के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहते हैं- "धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य"।
'यह दंतुरित मुस्कान' कविता का केंद्रीय भाव एक छोटे बच्चे की निश्छल, मनमोहक मुस्कान के प्रभाव का वर्णन करना है। कवि नागार्जुन के अनुसार, बच्चे की यह मुस्कान इतनी शक्ति रखती है कि वह किसी मृतक में भी प्राण डाल सकती है, पत्थर जैसे कठोर हृदय को पिघला सकती है, और नीरस वातावरण में भी आनंद और सौंदर्य भर सकती है। कवि ने इस मुस्कान की तुलना झोंपड़ी में खिले कमल से की है। यह कविता वात्सल्य भाव से ओतप्रोत है और यह दर्शाती है कि एक शिशु की सहज क्रियाएँ भी कितनी जीवनदायिनी और प्रेरणास्पद हो सकती हैं। यह कविता मनुष्य और उसकी सहज भावनाओं के बीच के गहरे संबंध को उजागर करती है।
जी हाँ, 'फसल' कविता स्पष्ट रूप से यह संदेश देती है कि कोई भी महान सृजन अकेले नहीं होता, बल्कि उसके पीछे प्रकृति और मनुष्य का परस्पर सहयोग होता है। कवि बताते हैं कि फसल किसी एक का चमत्कार नहीं है।
- प्रकृति का योगदान: इसके लिए नदियों का पानी, सूरज की किरणें, हवा की गति और मिट्टी के पोषक तत्व जैसे प्राकृतिक घटक अनिवार्य हैं। इनके बिना बीज अंकुरित ही नहीं हो सकता।
- मनुष्य का योगदान: वहीं दूसरी ओर, केवल प्रकृति ही फसल नहीं उगा सकती। इसके लिए करोड़ों किसानों का अथक परिश्रम, उनके हाथों का स्पर्श, उनकी मेहनत और देखभाल भी उतनी ही आवश्यक है।
इस प्रकार, कविता हमें सिखाती है कि जब मनुष्य और प्रकृति एक साथ मिलकर काम करते हैं, तभी 'फसल' जैसा सृजन संभव हो पाता है। यह कविता हमें सामूहिक प्रयास और सह-अस्तित्व के महत्व का पाठ पढ़ाती है।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master Nagarjun's Poetry 🌱
We hope this detailed guide on "यह दंतुरित मुस्कान एवं फसल" has cleared all your doubts. Understanding them not only helps in exams but also deepens our appreciation for life's simple joys and the hard work behind what we consume. All the best!
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