Updated NCERT Solutions for नौबतखाने में इबादत | Class 10 Hindi Ch 16 Important Questions (2026-27)
Welcome, students! This guide provides detailed NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 16, "नौबतखाने में इबादत". We will explore the inspiring life of Ustad Bismillah Khan and his devotion to music. This chapter is crucial for your CBSE board exams and teaches valuable life lessons.
Chapter at a Glance
Chapter 16: नौबतखाने में इबादत – Quick Reference
| Chapter Name | नौबतखाने में इबादत (Naubatkhane Mein Ibadat) |
| Author | यतीन्द्र मिश्र (Yatindra Mishra) |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Board / Class | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जीवन, शहनाई का महत्व, गंगा-जमुनी तहज़ीब, संगीत के प्रति समर्पण, सादगी और धर्मनिरपेक्षता। |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Learning Objectives
Understand the life, struggles, and achievements of the great shehnai maestro, Ustad Bismillah Khan.
Appreciate the importance of the shehnai in Indian culture and music.
Explain the concept of 'गंगा-जमुनी तहज़ीब' (communal harmony) as exemplified by Bismillah Khan's life.
Analyze the themes of dedication, simplicity, and true worship through art.
Confidently answer all questions from this chapter in your board exams.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions – All Exercise Questions
शहनाई की दुनिया में डुमराँव को दो मुख्य कारणों से याद किया जाता है:
- प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्मस्थान: भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जन्म बिहार के डुमराँव गाँव में हुआ था।
- शहनाई में प्रयुक्त होने वाली रीड: शहनाई बजाने के लिए जिस रीड का उपयोग होता है, वह एक विशेष प्रकार की घास 'नरकट' से बनती है। यह नरकट डुमराँव में मुख्य रूप से सोन नदी के किनारे पाई जाती है। इसी कारण शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के पूरक हैं।
बिस्मिल्ला खाँ को 'शहनाई की मंगलध्वनि का नायक' इसलिए कहा गया है क्योंकि उन्होंने शहनाई को एक साधारण लोक वाद्ययंत्र के स्तर से उठाकर शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित किया।
- मांगलिक अवसरों का वाद्य: शहनाई को हमेशा से ही एक मांगलिक वाद्य माना जाता रहा है, जिसे मंदिरों, विवाह समारोहों और अन्य शुभ अवसरों पर बजाया जाता है।
- शास्त्रीय प्रतिष्ठा: बिस्मिल्ला खाँ ने अपनी अस्सी वर्षों की साधना से शहनाई की मंगलध्वनि को पूरी दुनिया में प्रसिद्ध कर दिया। उन्होंने शहनाई में राग-रागिनियों को बजाकर उसे शास्त्रीय संगीत की दुनिया में सम्मान दिलाया।
- भारत की पहचान: 15 अगस्त 1947 को देश की आज़ादी के अवसर पर लाल किले से शहनाई बजाने का सम्मान भी उन्हें मिला। उनकी शहनाई की ध्वनि भारत की सांस्कृतिक और मांगलिक पहचान बन गई।
सुषिर-वाद्य: ऐसे वाद्ययंत्र जिन्हें फूँक मारकर बजाया जाता है, उन्हें 'सुषिर-वाद्य' कहते हैं। उदाहरण के लिए - बाँसुरी, शंख, शहनाई, मुरली आदि।
'सुषिर-वाद्यों में शाह' की उपाधि: शहनाई को 'सुषिर-वाद्यों में शाह' (अर्थात् सुषिर-वाद्यों का राजा) की उपाधि इसलिए दी गई होगी क्योंकि:
- मधुर और मांगलिक ध्वनि: इसकी ध्वनि अत्यंत मधुर, कर्णप्रिय और मंगलकारी होती है, जो अन्य सुषिर-वाद्यों से इसे श्रेष्ठ बनाती है।
- व्यापक प्रयोग: इसका प्रयोग लोक संगीत से लेकर शास्त्रीय संगीत, मंदिरों से लेकर राष्ट्रीय समारोहों तक हर महत्वपूर्ण स्थान पर होता है।
- भावपूर्ण प्रस्तुति: शहनाई में भावनाओं को व्यक्त करने की अद्भुत क्षमता होती है। बिस्मिल्ला खाँ जैसे उस्ताद ने अपनी कला से यह साबित कर दिया कि शहनाई हर तरह के भावों को सुरों में ढाल सकती है।
(क) 'फटा सुर न बख्शें। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।'
आशय: इस कथन से बिस्मिल्ला खाँ की सादगी और संगीत के प्रति उनके गहरे समर्पण का पता चलता है। उनके लिए बाहरी दिखावा या पहनावा महत्वहीन था। एक बार जब उनकी शिष्या ने उन्हें फटी तहमद (लुंगी) पहनने पर टोका, तो उन्होंने कहा कि वे ईश्वर से हमेशा सच्चा और सुरीला सुर माँगते हैं, न कि कीमती वस्त्र। उनके लिए सुर साधना ही सर्वोच्च थी। फटे कपड़े तो सिले जा सकते हैं, लेकिन एक बार सुर बिगड़ जाए तो उसे सुधारना बहुत मुश्किल होता है और ईश्वर से प्रार्थना है कि वह उन्हें कभी फटा या बेसुरा सुर न दें।
(ख) 'मेरे मालिक सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ।'
आशय: यह कथन बिस्मिल्ला खाँ की संगीत के प्रति सच्ची इबादत और उनकी गहरी आकांक्षा को दर्शाता है। वे संगीत को केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का एक माध्यम मानते थे। वे अपने 'मालिक' यानी ईश्वर से यह प्रार्थना करते थे कि उनके संगीत में इतनी गहराई, सच्चाई और प्रभाव (तासीर) हो कि उसे सुनकर लोगों की आँखों से感動 के सच्चे आँसू निकल आएँ। वे चाहते थे कि उनका संगीत श्रोताओं के दिलों को छू जाए और एक सच्ची, पवित्र अनुभूति प्रदान करे।
काशी, जो बिस्मिल्ला खाँ की जान और आत्मा थी, में हो रहे कुछ परिवर्तन उन्हें बहुत दुःखी और व्यथित करते थे। ये परिवर्तन थे:
- संगीत और साहित्य के प्रति घटती रुचि: काशी जो संगीत, साहित्य और अदब की परंपराओं के लिए जानी जाती थी, वहाँ अब इन चीजों के प्रति लोगों में पहले जैसा सम्मान और रुचि नहीं रह गई थी।
- कलाकारों की कद्र में कमी: पहले गायकों और वादकों के लिए जो सम्मान और कद्र थी, वह अब कम हो रही थी।
- खान-पान की पुरानी परंपराओं का लुप्त होना: काशी की प्रसिद्ध देसी घी की कचौड़ी-जलेबी जैसी चीजें अब पहले जैसी गुणवत्ता और स्वाद वाली नहीं मिलती थीं।
- सांप्रदायिक सद्भाव में कमी: बिस्मिल्ला खाँ को इस बात की चिंता थी कि काशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब, जहाँ हिंदू और मुसलमान मिलकर रहते थे, कहीं खत्म न हो जाए।
(क) बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे।
पाठ में कई ऐसे प्रसंग हैं जो साबित करते हैं कि बिस्मिल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति (गंगा-जमुनी तहज़ीब) के प्रतीक थे:
- वे एक शिया मुसलमान होते हुए भी काशी के बालाजी मंदिर में वर्षों तक शहनाई बजाते रहे।
- वे गंगा नदी को 'गंगा मइया' कहते थे और काशी विश्वनाथ मंदिर की दिशा में मुँह करके बैठते थे।
- मुहर्रम के महीने में वे पूरी शिद्दत से शोक मनाते थे और उस दौरान किसी भी प्रकार का संगीत कार्यक्रम नहीं करते थे और न ही शहनाई बजाते थे।
- उनकी शहनाई में काशी के मंदिरों का मंगल और मुहर्रम का शोक दोनों एक साथ समाए हुए थे। वे कहते थे, "काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बालाजी का मंदिर यहाँ"।
(ख) वे वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इनसान थे।
बिस्मिल्ला खाँ वास्तविक अर्थों में एक सच्चे इंसान थे, इसके प्रमाण निम्नलिखित हैं:
- सादगी: 'भारत रत्न' जैसा सर्वोच्च सम्मान पाने के बाद भी वे अत्यंत सादगीपूर्ण जीवन जीते थे। वे अक्सर फटी तहमद और साधारण कपड़ों में ही रहते थे।
- निरभिमान: उनमें रत्ती भर भी अभिमान नहीं था। वे खुद को एक साधारण संगीत साधक ही मानते थे।
- कला के प्रति समर्पण: उनके लिए संगीत ही ईश्वर की इबादत थी। वे धन-दौलत और शोहरत से अधिक अपने सुरों की शुद्धता को महत्व देते थे।
- धार्मिक सद्भाव: वे सभी धर्मों का समान रूप से आदर करते थे। वे सच्चे मुसलमान थे, लेकिन हिंदुओं के त्योहारों और आस्थाओं का भी पूरा सम्मान करते थे।
- देश प्रेम: उन्हें अपने देश और अपनी जन्मभूमि काशी से गहरा लगाव था। अमेरिका में एक शिष्य द्वारा बसने के प्रस्ताव पर उन्होंने कहा था कि वे वहाँ गंगा और काशी को नहीं ला सकते।
बिस्मिल्ला खाँ की संगीत साधना को समृद्ध करने में कई घटनाओं और व्यक्तियों का महत्वपूर्ण योगदान था:
- मामाओं का सान्निध्य: उनके नाना और दोनों मामा, सादिक हुसैन और अलीबख्श, देश के जाने-माने शहनाई वादक थे। बचपन से ही उन्हें सुनकर और उनसे सीखकर बिस्मिल्ला खाँ की संगीत में गहरी रुचि पैदा हुई।
- बालाजी मंदिर का रास्ता: वे जब चार साल के थे, तो अपने नाना को शहनाई बजाते हुए सुनते थे। जिस रास्ते से वे मंदिर जाते थे, वहाँ रसूलनबाई और बतूलनबाई नामक दो गायिका बहनों का घर था। उनके द्वारा गाई जा रही ठुमरी, टप्पे आदि को सुनकर उनके मन में संगीत के प्रति गहरी आसक्ति पैदा हुई।
- बालाजी मंदिर में रियाज़: वे घंटों बालाजी मंदिर के नौबतखाने में रियाज़ करते थे। मंदिर का शांत और आध्यात्मिक वातावरण उनकी साधना के लिए बहुत अनुकूल था।
- काशी और गंगा का प्रभाव: काशी का धार्मिक और सांस्कृतिक माहौल और गंगा के किनारे बैठकर रियाज़ करना उनकी कला में गहराई और पवित्रता लाता था। वे गंगा को अपनी माँ मानते थे।
- मुहर्रम का शोक: मुहर्रम के दिनों में शोक मनाना और उस दौरान होने वाले मातम में भाग लेना भी उनकी कला का एक हिस्सा था, जिसने उनके संगीत में करुणा और दर्द के भाव भरे।
Extra Important Questions (Board Exam Style 2026-27)
बिस्मिल्ला खाँ के लिए शहनाई उनकी इबादत और जीने का जरिया थी, जबकि काशी उनकी जन्नत थी। वे कहते थे कि काशी को छोड़कर वे कहीं नहीं जा सकते क्योंकि गंगा मइया और बालाजी का मंदिर वहीं हैं। उनकी शहनाई काशी के मंदिरों में गूँजती थी और उनका जीवन काशी की संस्कृति में रचा-बसा था। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे।
मुहर्रम के महीने में बिस्मिल्ला खाँ और उनका पूरा खानदान दस दिनों तक शोक मनाते थे। वे न तो शहनाई बजाते थे और न ही किसी संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लेते थे। आठवीं तारीख को वे पैदल चलते हुए मातम में हिस्सा लेते थे। इससे उनके अपने धर्म के प्रति गहरी आस्था और सांप्रदायिक सद्भाव की भावना का पता चलता है।
रसूलनबाई और बतूलनबाई दो गायिका बहनें थीं, जिनके घर के पास से बिस्मिल्ला खाँ अपने नाना के घर जाते थे। बचपन में उनके द्वारा गाई जाने वाली ठुमरी, टप्पे, दादरा आदि को सुनकर बिस्मिल्ला खाँ के मन में संगीत के प्रति गहरी रुचि और आकर्षण पैदा हुआ।
यह कथन पूर्णतः सत्य है। बिस्मिल्ला खाँ एक शिया मुसलमान होते हुए भी काशी के बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे, गंगा को 'मइया' कहते थे और बाबा विश्वनाथ के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे। उनका संगीत जितना मुहर्रम के शोक में डूबता था, उतना ही मंदिरों की मंगलध्वनि में भी गूँजता था। यह दर्शाता है कि सच्चा संगीत और कलाकार धर्म की सीमाओं से परे होता है।
बिस्मिल्ला खाँ ने दो फिल्मों में काम किया, लेकिन उन्हें फिल्मी दुनिया की चकाचौंध और बनावटीपन रास नहीं आया। उन्हें संगीत की साधना में किसी भी तरह का बाहरी हस्तक्षेप पसंद नहीं था। वे बनावटी और व्यावसायिक माहौल में अपनी कला की पवित्रता को बनाए रखना चाहते थे, इसलिए उन्होंने फिल्म जगत से दूरी बना ली।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ न केवल एक महान कलाकार थे, बल्कि एक असाधारण इंसान भी थे। उनकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सरल और सादा जीवन: भारत रत्न मिलने के बाद भी वे अत्यंत सादगी से रहते थे। लुंगी और साधारण कुर्ता उनकी पहचान थी।
- संगीत के प्रति सच्ची इबादत: उनके लिए संगीत केवल पेशा नहीं, बल्कि ईश्वर की प्रार्थना थी। वे हमेशा ईश्वर से सच्चा सुर माँगते थे।
- सांप्रदायिक सद्भाव के प्रतीक: वे एक सच्चे मुसलमान थे, पर हिंदू धर्म और उसकी परंपराओं का भी पूरा सम्मान करते थे। उनका जीवन गंगा-जमुनी तहज़ीब का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
- निरभिमानी स्वभाव: अपार सफलता और सम्मान पाने के बाद भी उनमें लेशमात्र भी अहंकार नहीं था। वे खुद को संगीत का एक विनम्र विद्यार्थी ही मानते थे।
- देशभक्ति: उन्हें अपनी मातृभूमि काशी और भारत से गहरा प्रेम था। वे कहते थे कि वे दुनिया में कहीं भी रहें, उनका मन हमेशा काशी में ही लगा रहता है।
शहनाई एक सुषिर-वाद्य है, जिसे फूँककर बजाया जाता है। यह मांगलिक अवसरों का प्रमुख वाद्य है। प्राचीन काल में इसे 'शाहनेय' (सुषिर-वाद्यों में शाह) कहा जाता था। पहले यह नौबतखानों या लोक संगीत तक ही सीमित था।
उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ ने शहनाई को शास्त्रीय संगीत के मंच पर प्रतिष्ठित करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उन्होंने:
- रियाज़ और साधना: अपनी अस्सी साल की निरंतर साधना से शहनाई वादन की तकनीक को परिष्कृत किया।
- शास्त्रीय रागों का वादन: उन्होंने शहनाई पर विभिन्न शास्त्रीय रागों को बजाकर यह सिद्ध कर दिया कि यह केवल लोक वाद्य नहीं, बल्कि एक गंभीर शास्त्रीय वाद्ययंत्र भी है।
- राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंच: उन्होंने भारत के लाल किले से लेकर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संगीत समारोहों तक शहनाई की मधुर ध्वनि को पहुँचाया।
इस प्रकार, बिस्मिल्ला खाँ के प्रयासों से शहनाई को वह सम्मान और प्रतिष्ठा मिली, जिसकी वह हकदार थी।
चित्र में उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पूरी तन्मयता से शहनाई वादन में लीन हैं। उनकी बंद आँखें दर्शाती हैं कि वे संगीत को केवल बजा नहीं रहे, बल्कि उसे जी रहे हैं, उसकी 'इबादत' कर रहे हैं।
'नौबतखाने में इबादत' पाठ के अनुसार, सच्ची इबादत का अर्थ है अपने कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण, निष्ठा और पवित्रता का भाव रखना। यह केवल मंदिर-मस्जिद में की जाने वाली प्रार्थना तक सीमित नहीं है। बिस्मिल्ला खाँ के लिए उनकी शहनाई का रियाज़ ही उनकी नमाज़ और प्रार्थना थी। जब कोई व्यक्ति अपने काम को पूरी ईमानदारी और लगन से करता है, तो उसका काम ही पूजा बन जाता है।
एक विद्यार्थी के लिए मन लगाकर पढ़ना, एक डॉक्टर के लिए निस्वार्थ भाव से मरीज़ का इलाज करना, और एक कलाकार के लिए अपनी कला की साधना करना - यह सब सच्ची इबादत के ही रूप हैं।
"काशी संस्कृति की पाठशाला है" का अर्थ है कि काशी एक ऐसा शहर है जहाँ संगीत, साहित्य, कला और विभिन्न धर्मों की मिली-जुली परंपराएँ एक साथ फलती-फूलती हैं। यह शहर सदियों से ज्ञान और तहज़ीब का केंद्र रहा है।
बिस्मिल्ला खाँ का जीवन पूरी तरह से काशी से जुड़ा हुआ था। उनका जन्म भले ही डुमराँव में हुआ, पर उनकी संगीत शिक्षा, उनका रियाज़, और उनकी आत्मा काशी में ही बसी थी। वे बालाजी मंदिर में शहनाई बजाते थे, गंगा किनारे बैठकर रियाज़ करते थे, और विश्वनाथ जी के प्रति असीम श्रद्धा रखते थे। काशी की होली और मुहर्रम दोनों ही उनके जीवन का हिस्सा थे। काशी के खान-पान, उसकी गलियाँ, और उसके लोग उनकी शहनाई के सुरों में बसते थे। इसीलिए वे कहते थे कि काशी को छोड़कर जाना उनके लिए संभव नहीं है, क्योंकि यह उनकी संस्कृति और पहचान की जड़ है।
यह कथन बिस्मिल्ला खाँ के जीवन के दो सबसे महत्वपूर्ण मूल्यों को उजागर करता है:
- कला के प्रति सर्वोच्च प्राथमिकता: उनके लिए उनका संगीत और सुर सबसे ऊपर थे। वे ईश्वर से भौतिक सुख-सुविधा या अच्छे कपड़े नहीं, बल्कि एक सच्चा और सुरीला सुर माँगते थे। यह दर्शाता है कि वे अपनी कला को कितनी गंभीरता और पवित्रता से लेते थे।
- सादगी और भौतिकता से दूरी: यह दिखाता है कि वे बाहरी दिखावे और भौतिक वस्तुओं को कोई महत्व नहीं देते थे। एक फटी लुंगी उनके लिए चिंता का विषय नहीं थी, लेकिन एक 'फटा सुर' उनके लिए असहनीय था। यह उनकी सादगी और एक सच्चे साधक की निशानी है।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master नौबतखाने में इबादत 🎼
"नौबतखाने में इबादत" सिर्फ एक जीवनी नहीं है, बल्कि सच्ची लगन, सादगी और सांप्रदायिक सौहार्द की एक प्रेरणादायक कहानी है। उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची इबादत किसी भी रूप में की जा सकती है।
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