NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 15: स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन
Welcome, students! This guide provides detailed NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 15, "स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन". We'll break down Mahavir Prasad Dwivedi's powerful arguments for women's education, making this important chapter easy to understand for your CBSE board exams.
Chapter at a Glance
Chapter 15 Quick Reference
| Chapter Name | स्त्री शिक्षा के विरोधी कुतर्कों का खंडन |
| Author | महावीर प्रसाद द्विवेदी |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Class / Board | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | Arguments against women's education, historical examples, logic vs. fallacy. |
| Difficulty Level | Moderate |
| Exam Weightage | 4–6 Marks |
Key Figures & Concepts
Learning Objectives
Understand the flawed arguments (कुतर्क) used against women's education in the early 20th century.
Analyze how Mahavir Prasad Dwivedi uses historical and logical examples to counter these arguments.
Explain the importance of education for women and its role in societal progress.
Identify key figures like Shakuntala, Sita, Gargi, and Mandan Mishra's wife mentioned in the text.
Develop critical thinking skills to differentiate between logical arguments and fallacies.
Answer all NCERT and board exam questions from this chapter with confidence.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 15
द्विवेदी जी ने स्त्री-शिक्षा का समर्थन करने के लिए निम्नलिखित तर्क दिए:
- प्राचीन काल में स्त्रियाँ शिक्षित थीं: द्विवेदी जी ने उदाहरण दिया कि प्राचीन भारत में गार्गी, मैत्रेयी, और शीला जैसी विदुषी महिलाएँ थीं, जिन्होंने बड़े-बड़े ब्रह्मज्ञानियों को शास्त्रार्थ में हराया था। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में स्त्री-शिक्षा का प्रचलन था।
- नाटकों के उदाहरण का खंडन: विरोधियों का तर्क था कि कालिदास के नाटक 'अभिज्ञानशाकुंतलम्' में शकुंतला ने दुष्यंत को जो कठोर शब्द कहे, वह उसकी शिक्षा का ही दुष्परिणाम था। द्विवेदी जी ने इसका खंडन करते हुए कहा कि शकुंतला के शब्द उसकी शिक्षा के कारण नहीं, बल्कि उसके साथ हुए अन्याय और अपमान की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थे।
- भाषा का तर्क: कुछ लोग कहते थे कि प्राचीन काल की स्त्रियाँ प्राकृत भाषा बोलती थीं, जो उनके अनपढ़ होने का सबूत है। द्विवेदी जी ने बताया कि उस समय प्राकृत आम बोलचाल की भाषा थी। भगवान बुद्ध और उनके शिष्य भी प्राकृत में ही उपदेश देते थे। अतः, प्राकृत बोलना अनपढ़ होने का प्रमाण नहीं है।
- शिक्षा प्रणाली में सुधार आवश्यक: द्विवेदी जी ने यह भी माना कि यदि पुरानी शिक्षा प्रणाली में कोई दोष है, तो उसे खत्म करने की बजाय उसमें सुधार करना चाहिए। शिक्षा को पूरी तरह से बंद कर देना एक मूर्खतापूर्ण समाधान है।
- शिक्षा अनर्थ का कारण नहीं: उनका मानना था कि शिक्षा अनर्थ का कारण नहीं होती। अगर पढ़े-लिखे पुरुष भी चोरी, डकैती और हत्या जैसे अपराध कर सकते हैं, तो इसका दोष शिक्षा को नहीं दिया जा सकता। उसी तरह, स्त्रियों के लिए भी शिक्षा को दोष देना गलत है।
'स्त्रियों को पढ़ाने से अनर्थ होते हैं'—इस कुतर्क का खंडन द्विवेदी जी ने बड़े ही प्रभावशाली ढंग से किया है:
- पुरुषों के उदाहरण: द्विवेदी जी कहते हैं कि अगर स्त्रियों की शिक्षा से अनर्थ होता है, तो पुरुषों की शिक्षा से भी अनर्थ होते हैं। पुरुष भी शिक्षा का दुरुपयोग करके चोरी, हिंसा, और भ्रष्टाचार जैसे अपराध करते हैं। तो क्या इस तर्क पर पुरुषों के सारे स्कूल और कॉलेज बंद कर दिए जाने चाहिए?
- शकुंतला का पक्ष: उन्होंने शकुंतला का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि उसने जो कुछ भी राजा दुष्यंत से कहा, वह उसके स्वाभिमान और न्याय की पुकार थी, न कि उसकी शिक्षा का घमंड। एक परित्यक्ता नारी का ऐसा व्यवहार स्वाभाविक था।
- सीता का उदाहरण: उन्होंने सीता का भी उदाहरण दिया। जब राम ने सीता पर संदेह करके उन्हें त्याग दिया, तो उन्होंने भी लक्ष्मण के माध्यम से राम को जो संदेश भेजा, वह एक स्वाभिमानी और शिक्षित स्त्री का ही परिचायक था।
- शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य: द्विवेदी जी के अनुसार, शिक्षा व्यक्ति को सोचने-समझने और सही-गलत में भेद करने की शक्ति देती है। यह अनर्थ का कारण नहीं, बल्कि समाज की प्रगति का साधन है। अनर्थ व्यक्ति के आचरण से होते हैं, शिक्षा से नहीं।
द्विवेदी जी ने अपने निबंध में व्यंग्य का চমৎকার प्रयोग किया है। कुछ व्यंग्यात्मक अंश निम्नलिखित हैं:
- "स्त्रियों के लिए पढ़ना कालकूट और पुरुषों के लिए पीयूष का घूँट! ऐसी ही दलीलों और दृष्टांतों के आधार पर कुछ लोग स्त्रियों को अपढ़ रखकर भारतवर्ष का गौरव बढ़ाना चाहते हैं।"
अर्थ: यहाँ लेखक व्यंग्य कर रहे हैं कि कैसे कुछ लोग मानते हैं कि शिक्षा स्त्रियों के लिए जहर (कालकूट) और पुरुषों के लिए अमृत (पीयूष) है। वे इस दोहरी मानसिकता पर कटाक्ष करते हैं जो स्त्रियों को अनपढ़ रखकर देश का गौरव बढ़ाने का खोखला सपना देखते हैं। - "अत्रि की पत्नी पत्नी-धर्म पर व्याख्यान देते समय घंटो पांडित्य प्रकट करे, गार्गी बड़े-बड़े ब्रह्मवादियों को हरा दे, मंडन मिश्र की सहधर्मचारिणी शंकराचार्य के छक्के छुड़ा दे! गज़ब! इससे अधिक भयंकर बात और क्या हो सकेगी!"
अर्थ: इस अंश में, लेखक उन लोगों पर व्यंग्य कर रहे हैं जो शिक्षित और विद्वान स्त्रियों के अस्तित्व को ही "भयंकर" मानते हैं। वे विडंबना दिखाते हैं कि कैसे समाज स्त्री की बुद्धिमत्ता और ज्ञान से डरता है। - "मान लीजिए कि पुराने जमाने में भारत की एक भी स्त्री पढ़ी-लिखी न थी। न सही। उस समय स्त्रियों को पढ़ाने की ज़रूरत न समझी गई होगी। पर अब तो है। अत: पढ़ाना चाहिए।"
अर्थ: यहाँ लेखक एक सीधी और सरल बात कहकर विरोधियों की सोच पर व्यंग्य करते हैं। वे कहते हैं कि अगर मान भी लें कि पहले स्त्रियाँ नहीं पढ़ती थीं, तो क्या हुआ? अब ज़रूरत है, तो अब पढ़ाना चाहिए। यह व्यंग्य उन लोगों पर है जो अतीत से चिपके रहते हैं और वर्तमान की ज़रूरतों को अनदेखा करते हैं।
नहीं, पुराने समय में स्त्रियों का प्राकृत भाषा में बोलना उनके अनपढ़ होने का सबूत बिलकुल नहीं है। पाठ के आधार पर द्विवेदी जी ने इसे निम्नलिखित तर्कों से स्पष्ट किया है:
- प्राकृत जनसामान्य की भाषा थी: उस समय प्राकृत आम लोगों की बोलचाल की भाषा थी, ठीक वैसे ही जैसे आज हिंदी या अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ हैं। जिस तरह आज हिंदी बोलने वाला व्यक्ति अनपढ़ नहीं माना जाता, उसी तरह उस समय प्राकृत बोलने वाला भी अनपढ़ नहीं था।
- बौद्ध और जैन धर्म के ग्रंथ: भगवान बुद्ध और उनके अनुयायियों ने अपने उपदेश प्राकृत भाषा में ही दिए थे। बौद्ध और जैन धर्म के हजारों ग्रंथ प्राकृत में ही लिखे गए हैं। यदि प्राकृत अनपढ़ों की भाषा होती, तो इतने महत्वपूर्ण धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ इस भाषा में क्यों लिखे जाते?
- संस्कृत नाटकों का प्रमाण: संस्कृत के प्रसिद्ध नाटकों में भी स्त्री पात्रों और अन्य सामान्य पात्रों को प्राकृत बोलते हुए दिखाया गया है, जबकि उच्च वर्ग के पुरुष पात्र संस्कृत बोलते थे। इसका यह मतलब नहीं कि वे स्त्रियाँ अनपढ़ थीं, बल्कि यह उस समय के सामाजिक यथार्थ का चित्रण था कि अलग-अलग वर्ग के लोग अलग-अलग भाषाएँ बोलते थे।
अतः, प्राकृत बोलना अशिक्षित होने का नहीं, बल्कि उस समय की प्रचलित भाषा का प्रयोग करने का प्रमाण है।
यह कथन पूरी तरह से सत्य है कि हमें परंपरा के केवल उन्हीं पक्षों को स्वीकार करना चाहिए जो स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देते हों। इसके पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिए जा सकते हैं:
- समय के साथ बदलाव ज़रूरी है: परंपराएँ समाज द्वारा एक विशेष समय और परिस्थिति में बनाई जाती हैं। समय बदलने के साथ-साथ समाज की ज़रूरतें और सोच भी बदलती हैं। जो परंपराएँ आज के प्रगतिशील समाज में स्त्री-पुरुष के बीच भेदभाव पैदा करती हैं, जैसे- बाल विवाह, सती प्रथा, या स्त्रियों को शिक्षा से वंचित रखना, उन्हें त्याग देना ही उचित है।
- समानता मौलिक अधिकार है: स्त्री और पुरुष दोनों समाज के बराबर के हिस्सेदार हैं। भारतीय संविधान भी लिंग के आधार पर किसी भी भेदभाव का विरोध करता है और सभी को समानता का अधिकार देता है। जो परंपराएँ इस मौलिक अधिकार का हनन करती हैं, वे अस्वीकार्य हैं।
- समाज की प्रगति के लिए आवश्यक: जब तक समाज के आधे हिस्से (स्त्रियों) को समान अवसर और अधिकार नहीं मिलेंगे, तब तक कोई भी समाज या देश पूरी तरह से विकसित नहीं हो सकता। स्त्री-पुरुष समानता को बढ़ावा देने वाली परंपराएँ, जैसे- शिक्षा का समान अधिकार, संपत्ति का अधिकार, आदि समाज को मजबूत और प्रगतिशील बनाती हैं।
अतः, हमें परंपराओं का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए। हमें विवेक का प्रयोग करके केवल उन प्रगतिशील और मानवीय परंपराओं को अपनाना चाहिए जो समानता, न्याय और सम्मान के सिद्धांतों पर आधारित हों।
तब की (द्विवेदी जी के समय की) और अब की शिक्षा प्रणाली में काफी अंतर है:
| आधार | तब की शिक्षा प्रणाली (प्रारंभिक 20वीं सदी) | अब की शिक्षा प्रणाली (21वीं सदी) |
|---|---|---|
| पहुँच | शिक्षा कुछ विशेष वर्गों और मुख्य रूप से पुरुषों तक ही सीमित थी। स्त्रियों के लिए शिक्षा के अवसर बहुत कम थे। | शिक्षा एक मौलिक अधिकार है। 'सर्व शिक्षा अभियान' और 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाओं से यह सभी के लिए, विशेषकर लड़कियों के लिए सुलभ हुई है। |
| विषय | पारंपरिक विषयों जैसे साहित्य, धर्म, और दर्शन पर अधिक जोर था। तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा का अभाव था। | विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, कला, और कई व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की एक विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध है। |
| उद्देश्य | शिक्षा का उद्देश्य अक्सर ज्ञान प्राप्ति और शास्त्रीय पांडित्य तक सीमित था। | शिक्षा का उद्देश्य ज्ञान के साथ-साथ कौशल विकास, रोजगार-उन्मुख तैयारी और समग्र व्यक्तित्व का विकास करना है। |
| तकनीक | शिक्षा गुरुकुल या पारंपरिक स्कूलों में मौखिक और पुस्तकों पर आधारित थी। तकनीक का कोई स्थान नहीं था। | शिक्षा में कंप्यूटर, इंटरनेट, स्मार्ट क्लासरूम और ऑनलाइन लर्निंग प्लेटफॉर्म (e-learning) का व्यापक रूप से उपयोग होता है। |
| समानता | स्त्री-पुरुष के बीच शिक्षा को लेकर गहरा भेदभाव था। | सरकार और समाज दोनों ही स्त्री-पुरुष की समान शिक्षा पर जोर देते हैं। पाठ्यक्रम और अवसर दोनों के लिए समान हैं। |
संक्षेप में, तब की शिक्षा प्रणाली सीमित, पारंपरिक और भेदभावपूर्ण थी, जबकि अब की शिक्षा प्रणाली अधिक व्यापक, आधुनिक, तकनीकी रूप से उन्नत और समानता पर आधारित है।
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Explanation: लेखक ने गार्गी का उदाहरण देकर साबित किया कि प्राचीन भारत में स्त्रियाँ बहुत शिक्षित थीं।
Explanation: द्विवेदी जी ने स्पष्ट किया कि शकुंतला की प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी, न कि उसकी शिक्षा का परिणाम।
Explanation: महावीर प्रसाद द्विवेदी 'सरस्वती' पत्रिका के संपादक थे और यह निबंध सितंबर 1914 के अंक में 'पढ़े-लिखों का पांडित्य' शीर्षक से छपा था।
लेखक ने व्यंग्य करते हुए कहा है कि यदि स्त्रियों की शिक्षा से अनर्थ होता है, तो पुरुषों की शिक्षा से भी बम फेंकने, चोरी करने और रिश्वत लेने जैसे अनर्थ होते हैं। तो क्या इस तर्क से पुरुषों के सभी स्कूल-कॉलेज बंद कर देने चाहिए? यह व्यंग्य विरोधियों के खोखले तर्क को उजागर करता है।
द्विवेदी जी के अनुसार, यदि शिक्षा व्यवस्था में कोई दोष है, तो उसे बंद नहीं करना चाहिए, बल्कि उसमें सुधार लाना चाहिए। किसी चीज़ में कमी होने पर उसे सुधारना बुद्धिमानी है, उसे पूरी तरह नष्ट कर देना नहीं।
लेखक ने 'नाट्यशास्त्र' संबंधी नियमों का उल्लेख यह बताने के लिए किया है कि पुराने नाटकों में स्त्री पात्रों का प्राकृत बोलना उनके अनपढ़ होने का सबूत नहीं है। यह नाट्यशास्त्र के नियमों के अनुसार था, जहाँ विभिन्न पात्रों के लिए अलग-अलग भाषाएँ निर्धारित थीं।
द्विवेदी जी के निबंध से यह स्पष्ट होता है कि शिक्षा एक व्यापक शब्द है जिसका अर्थ केवल अक्षर ज्ञान या कुछ पुस्तकें पढ़ लेना नहीं है।
- विवेक और तर्क: शिक्षा व्यक्ति को विवेक और तर्क शक्ति प्रदान करती है, जिससे वह सही और गलत में अंतर कर पाता है।
- आत्म-सम्मान: शिक्षा व्यक्ति में, विशेषकर स्त्रियों में, आत्म-सम्मान और आत्मविश्वास जगाती है। शकुंतला और सीता के उदाहरण यह दिखाते हैं कि शिक्षित स्त्रियाँ अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज उठा सकती हैं।
- सामाजिक प्रगति: शिक्षा केवल व्यक्तिगत विकास के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक प्रगति के लिए भी आवश्यक है। एक शिक्षित स्त्री पूरे परिवार को शिक्षित करती है, जिससे समाज आगे बढ़ता है।
- अनर्थ का कारण नहीं: द्विवेदी जी जोर देकर कहते हैं कि शिक्षा अनर्थ का कारण नहीं है। अनर्थ व्यक्ति के बुरे आचरण और संस्कार से होते हैं, न कि ज्ञान से। इस प्रकार, शिक्षा का दायरा बहुत विस्तृत है और यह मनुष्य के समग्र विकास का माध्यम है।
स्त्री-शिक्षा के विरोधी जो तर्क देते थे, वे आज के समाज में बिल्कुल भी प्रासंगिक नहीं हैं।
- कानूनी अधिकार: आज शिक्षा एक मौलिक अधिकार है और सरकार 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' जैसी योजनाओं के माध्यम से इसे बढ़ावा दे रही है।
- सामाजिक सोच में बदलाव: समाज की सोच में भारी परिवर्तन आया है। आज लोग अपनी बेटियों को बेटों के बराबर पढ़ाना चाहते हैं।
- स्त्रियों की उपलब्धियाँ: आज स्त्रियाँ शिक्षा के बल पर हर क्षेत्र में—विज्ञान, राजनीति, सेना, व्यवसाय—पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रही हैं और देश का नाम रोशन कर रही हैं।
हालांकि, आज भी कुछ दूर-दराज के और पिछड़े इलाकों में पुरानी सोच वाले लोग मिल सकते हैं जो लड़कियों की शिक्षा को गैर-जरूरी समझते हैं। लेकिन व्यापक समाज में द्विवेदी जी के समय के कुतर्क पूरी तरह से अपनी प्रासंगिकता खो चुके हैं और हास्यास्पद लगते हैं।
- (MCQ) लेखक ने विमान और जहाजों का उदाहरण क्यों दिया है?
(क) यह बताने के लिए कि पुराना जमाना बहुत उन्नत था।
(ख) यह तर्क देने के लिए कि हर प्राचीन विद्या का लिखित शास्त्र मिलना जरूरी नहीं है।
(ग) यह बताने के लिए कि विश्वविद्यालय जरूरी नहीं हैं।
(घ) यह साबित करने के लिए कि पुराण गलत हैं।
Answer: (ख) यह तर्क देने के लिए कि हर प्राचीन विद्या का लिखित शास्त्र मिलना जरूरी नहीं है। - (Short Answer) "नियमबद्ध प्रणाली का उल्लेख आदि पुराणों में न मिले तो क्या आश्चर्य" - इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए। (Difficulty: Medium)
Answer: इस पंक्ति का आशय यह है कि यदि प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों को पढ़ाने के लिए किसी व्यवस्थित स्कूल या विश्वविद्यालय प्रणाली का जिक्र नहीं मिलता तो इसमें हैरान होने वाली कोई बात नहीं है। हो सकता है उस समय शिक्षा देने का तरीका अलग रहा हो या उससे संबंधित ग्रंथ समय के साथ नष्ट हो गए हों। किसी चीज़ का लिखित प्रमाण न मिलना यह साबित नहीं करता कि वह चीज़ अस्तित्व में ही नहीं थी। - (Long Answer) इस गद्यांश के माध्यम से लेखक स्त्री-शिक्षा के विरोधियों के किस तर्क का खंडन कर रहे हैं? (Difficulty: Hard)
Answer: इस गद्यांश के माध्यम से लेखक स्त्री-शिक्षा के विरोधियों के इस तर्क का खंडन कर रहे हैं कि "चूंकि प्राचीन ग्रंथों में स्त्रियों को व्यवस्थित रूप से पढ़ाने या उनके लिए विश्वविद्यालयों का कोई उल्लेख नहीं है, इसलिए उन्हें नहीं पढ़ाना चाहिए।" लेखक विमान और जहाज बनाने की विद्या का उदाहरण देकर कहते हैं कि प्राचीन काल में ये चीजें थीं, भले ही आज हमें उनके निर्माण-शास्त्र के ग्रंथ नहीं मिलते। ठीक उसी प्रकार, हो सकता है कि प्राचीन काल में स्त्रियाँ शिक्षित थीं, भले ही उसकी पूरी प्रणाली का लिखित ब्यौरा आज उपलब्ध न हो। लेखक का मत है कि लिखित प्रमाण के अभाव में किसी सत्य को नकारना मूर्खता है।
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