CBSE 2026-27 | क्षितिज भाग 2

NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 13: मानवीय करुणा की दिव्य चमक

📚 Class 10 CBSE 🇮🇳 Hindi Course A – Kshitij ⚡ 3–5 Marks 🔵 Medium

Welcome, students! This guide breaks down Class 10 Hindi Chapter 13, "मानवीय करुणा की दिव्य चमक," a beautiful memoir about Father Kamil Bulke. You'll learn about selfless love and humanity, which is crucial for your board exams. This chapter often features in exams, so let's master it together!

📋Chapter at a Glance

📚

Chapter 13: मानवीय करुणा की दिव्य चमक – Quick Reference

Chapter Nameमानवीय करुणा की दिव्य चमक (Manviya Karuna ki Divya Chamak)
Authorसर्वेश्वरदयाल सक्सेना (Sarveshwar Dayal Saxena)
SubjectHindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2)
Class / BoardCBSE Class 10
Target Year2026-27
Key TopicsFather Kamil Bulke's life, his love for India and Hindi, the author's memories, the true meaning of a 'Sanyasi'.
Difficulty LevelMedium
Exam Weightage3–5 Marks

📊Key Facts – Quick Facts to Remember

🇧🇪
जन्म
रैम्सचैपल
🇮🇳
कर्मभूमि
भारत
📚
शोध
रामकथा
✏️
लेखक
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
🌿
संस्था
परिमल
👬
मृत्यु
ज़हरबाद से

🎯Learning Objectives

1

Understand the life and personality of Father Kamil Bulke.

2

Analyse the deep bond between the author, Sarveshwar Dayal Saxena, and Father Bulke.

3

Explain why Father Bulke was called a 'divine spark of human compassion'.

4

Appreciate his immense contribution to the Hindi language.

5

Distinguish between a traditional 'Sanyasi' and Father Bulke's way of life.

6

Answer all NCERT and board exam questions effectively.

💡Key Concepts & Characters

फादर कामिल बुल्के
The central character. A Belgian missionary who came to India, adopted its culture, and dedicated his life to serving people and the Hindi language.
सर्वेश्वरदयाल सक्सेना
The author of this chapter, who shares his personal memories of Father Bulke.
मानवीय करुणा
Human compassion; a central theme of the chapter. Father Bulke is portrayed as an embodiment of this quality.
संन्यासी
A hermit or an ascetic. The chapter shows how Father Bulke was a 'Sanyasi' in spirit but not by traditional definition.
परिमल (Parimal)
A literary organization in Allahabad where the author and his friends, including Father Bulke, would have literary discussions.
रैम्सचैपल
Father Bulke's birthplace in Belgium.

Extra MCQs – Practice for Boards

💡
How to Use
Click an option to check if it's correct or wrong. The explanation will appear instantly.
Difficulty: Easy
Q1. फ़ादर कामिल बुल्के का जन्म किस देश में हुआ था?
✅ Correct: (ग) बेल्जियम
Difficulty: Easy
Q2. फ़ादर बुल्के ने अपना शोध कार्य किस विषय पर किया था?
✅ Correct: (ख) रामकथा: उत्पत्ति और विकास
Difficulty: Medium
Q3. लेखक के अनुसार, फ़ादर बुल्के की रगों में दूसरों के लिए क्या भरा था?
✅ Correct: (ख) मिठास (अमृत)
Difficulty: Medium
Q4. 'परिमल' क्या था?
✅ Correct: (ख) एक साहित्यिक संस्था
Difficulty: Hard
Q5. फ़ादर बुल्के की मृत्यु किस रोग से हुई?
✅ Correct: (ग) ज़हरबाद (गैंग्रीन)

📝Full NCERT Solutions – क्षितिज भाग 2

✅ Model Answer

लेखक ने फ़ादर बुल्के की उपस्थिति को देवदार की छाया जैसा कहा है क्योंकि:

  1. आशीर्वाद और शांति: जैसे देवदार का विशाल वृक्ष राहगीरों को शीतल छाया और शांति प्रदान करता है, वैसे ही फ़ादर बुल्के का सान्निध्य सबको सुकून और आशीर्वाद का एहसास कराता था।
  2. स्नेह और अपनत्व: वे सबसे बहुत स्नेह और अपनत्व से मिलते थे। उनके चेहरे पर हमेशा एक शांत भाव और करुणा झलकती थी।
  3. मार्गदर्शक: लेखक और उनके मित्रों के लिए वे एक बड़े भाई और मार्गदर्शक की तरह थे। वे उनके पारिवारिक उत्सवों और संस्कारों में एक पुरोहित की तरह शामिल होते और उन्हें अपना आशीर्वाद देते थे।
  4. दुःख में सहारा: वे सबके दुःख में शामिल होते थे और अपने सांत्वना भरे शब्दों से लोगों को हिम्मत बँधाते थे। उनकी उपस्थिति मात्र से ही बड़े से बड़ा दुःख कम लगने लगता था।

इन्हीं गुणों के कारण उनकी उपस्थिति देवदार की छाया जैसी लगती थी।

✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के को भारतीय संस्कृति का एक अभिन्न अंग निम्नलिखित आधारों पर कहा गया है:

  1. भारत को कर्मभूमि बनाया: बेल्जियम में जन्म लेने के बावजूद उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि के रूप में चुना और यहीं के होकर रह गए।
  2. हिंदी भाषा से प्रेम: उन्होंने न केवल हिंदी सीखी, बल्कि हिंदी के उत्थान के लिए भी काम किया। उन्होंने अपना प्रसिद्ध शोधकार्य "रामकथा: उत्पत्ति और विकास" हिंदी में ही लिखा।
  3. भारतीय संस्कारों को अपनाना: वे भारतीय त्योहारों और संस्कारों में पूरे मन से भाग लेते थे। लेखक के बेटे के अन्नप्राशन संस्कार में और पारिवारिक उत्सवों में वे एक बड़े-बुजुर्ग की तरह शामिल होते थे।
  4. गहन लगाव: वे कहते थे, "मैं अब संन्यासी हो गया हूँ... अब यह देश ही मेरा देश है, भारत।" यह बात भारत के प्रति उनके गहरे लगाव को दर्शाती है।

इन सभी कारणों से यह स्पष्ट है कि वे केवल एक विदेशी नहीं थे, बल्कि मन, कर्म और वचन से पूरी तरह भारतीय बन चुके थे।

✅ Model Answer

पाठ में फ़ादर बुल्के के हिंदी-प्रेम को दर्शाने वाले कई प्रसंग हैं:

  • उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया।
  • उन्होंने अपना शोध प्रबंध "रामकथा: उत्पत्ति और विकास" हिंदी में लिखा।
  • उन्होंने प्रसिद्ध अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश (Dictionary) तैयार किया।
  • वे 'परिमल' नाम की साहित्यिक संस्था से जुड़े थे, जहाँ वे हिंदी में गंभीर बहस करते थे।
  • जब कोई हिंदी भाषी व्यक्ति हिंदी की उपेक्षा करता था तो उन्हें बहुत दुःख होता था। वे हर मंच पर हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की वकालत करते थे।
  • उन्होंने बाइबिल का हिंदी में अनुवाद भी किया।

यह सब उनके हिंदी के प्रति गहरे और सच्चे प्रेम को दिखाता है।

✅ Model Answer

इस पाठ के आधार पर फ़ादर कामिल बुल्के की एक अत्यंत प्रभावशाली और करुणामयी छवि उभरती है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • करुणा और ममता: वे करुणा और वात्सल्य की प्रतिमूर्ति थे। उनका हृदय सबके लिए प्रेम से भरा था।
  • दृढ़ निश्चयी: उन्होंने भारत आकर हिंदी सेवा का जो संकल्प लिया, उसे जीवन भर निभाया।
  • सरल स्वभाव: इतने ज्ञानी होने के बावजूद उनमें अहंकार का लेशमात्र भी नहीं था। वे सबसे सरलता से मिलते थे।
  • भारतीयता के प्रतीक: वे विदेशी होते हुए भी सच्चे अर्थों में भारतीय थे। उन्होंने भारतीय संस्कृति और भाषा को पूरी तरह अपना लिया था।
  • सच्चे संन्यासी: वे पारंपरिक संन्यासी नहीं थे। वे रिश्ते बनाते थे और उन्हें पूरी शिद्दत से निभाते थे। उनका संन्यास मन का था, दुनिया से भागने का नहीं।

संक्षेप में, फ़ादर बुल्के एक देवदूत समान व्यक्ति थे, जिनका जीवन दूसरों के लिए प्रेम, सेवा और करुणा का संदेश देता है।

✅ Model Answer

लेखक ने फ़ादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ इसलिए कहा है क्योंकि उनके व्यक्तित्व में करुणा कूट-कूट कर भरी थी, जो किसी दिव्य प्रकाश के समान थी। इसके कारण हैं:

  • निःस्वार्थ प्रेम: वे जिससे भी रिश्ता बनाते थे, उसे पूरी ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से निभाते थे।
  • सबके प्रति अपनत्व: वे हर किसी के सुख-दुःख में शामिल होते थे। उनके प्रेम और अपनत्व में कोई शर्त नहीं थी।
  • क्षमा और वात्सल्य: उनका हृदय किसी के लिए भी कड़वाहट से नहीं भरता था। वे हमेशा प्रेम और क्षमा का भाव रखते थे।
  • सांत्वना देने की शक्ति: उनके सांत्वना भरे शब्द किसी जादू की तरह काम करते थे और दुःखी व्यक्ति को हिम्मत देते थे।

उनकी करुणा में एक दैवीय आभा थी, जो हर किसी को अपनी ओर खींच लेती थी। इसलिए लेखक के लिए वे मानवीय करुणा की एक दिव्य चमक थे।

✅ Model Answer

यह सत्य है कि फ़ादर बुल्के ने संन्यासी की परंपरागत छवि से हटकर एक नई छवि प्रस्तुत की है।

  • परंपरागत छवि: आमतौर पर एक संन्यासी सांसारिक मोह-माया और रिश्तों को त्यागकर अकेला रहता है। वह समाज और परिवार से कोई संबंध नहीं रखता।
  • फ़ादर बुल्के की छवि: इसके विपरीत, फ़ादर बुल्के संन्यासी होते हुए भी लोगों से गहरा रिश्ता बनाते थे।
    • वे लोगों के पारिवारिक उत्सवों और दुःखों में शामिल होते थे।
    • वे जिससे एक बार रिश्ता बना लेते थे, उसे कभी नहीं तोड़ते थे, चाहे कितनी भी दूर क्यों न हों।
    • वे पत्र लिखकर और मिलकर लोगों से संपर्क बनाए रखते थे।

इस प्रकार, उन्होंने यह दिखाया कि संन्यास का अर्थ दुनिया से भागना नहीं, बल्कि दुनिया में रहकर निःस्वार्थ भाव से लोगों की सेवा करना और उनसे प्रेम करना है। उन्होंने मोह और प्रेम के बीच का अंतर स्पष्ट किया।

✅ Model Answer

(क) नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है।

  • आशय: इस पंक्ति का आशय है कि फ़ादर बुल्के की मृत्यु पर रोने वालों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें गिनना संभव नहीं था। यह उनकी लोकप्रियता और लोगों के दिलों में उनके स्थान को दर्शाता है।
  • व्याख्या: लेखक कहना चाहते हैं कि उस दिन इतने लोग दुःखी थे और उनकी आँखों में आँसू थे कि उनकी गिनती करना व्यर्थ था। ऐसा करने का प्रयास केवल समय बर्बाद करना (स्याही फैलाना) होता। यह एक भावपूर्ण तरीका है यह बताने का कि फ़ादर बुल्के को चाहने वाले अनगिनत थे।

(ख) फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है।

  • आशय: इस पंक्ति का आशय है कि फ़ादर बुल्के की याद मन में एक गहरी उदासी और शांति का भाव एक साथ भर देती है।
  • व्याख्या: जब हम कोई उदास और शांत संगीत सुनते हैं, तो हमारा मन भारी हो जाता है, लेकिन साथ ही एक अजीब सा सुकून भी मिलता है। ठीक उसी तरह, जब लेखक फ़ादर को याद करते हैं, तो उन्हें खोने का दुःख तो होता है, लेकिन साथ ही उनकी स्नेहिल और शांत छवि मन में एक सुकून का एहसास भी कराती है। यह एक मिश्रित अनुभूति है - दुःख और शांति का संगम।

🚀Extra Board Exam Questions (2026-27)

📌 लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
✅ Model Answer

लेखक ने ऐसा इसलिए कहा क्योंकि फ़ादर बुल्के का पूरा जीवन प्रेम, अमृत और करुणा से भरा था। 'ज़हरबाद' एक कष्टदायक और पीड़ा देने वाली बीमारी है। लेखक को यह बहुत अनुचित लगा कि जिस व्यक्ति ने सबको मिठास और प्रेम बाँटा, उसकी मृत्यु इतने कष्ट और 'ज़हर' से हुई।

✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के का जन्म बेल्जियम के रैम्सचैपल में हुआ था। वहाँ उनके परिवार में माँ, दो भाई और एक बहन थे। वे अपनी माँ को बहुत याद करते थे और उनकी चिट्ठियाँ अक्सर लेखक को दिखाते थे। भारत में, वे लेखक और उनके मित्रों को ही अपना परिवार मानते थे और उनके हर सुख-दुःख में शामिल होते थे।

✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के के चरित्र की दो प्रमुख विशेषताएँ हैं:

  1. अगाध स्नेह: वे सबसे गहरा और निस्वार्थ स्नेह रखते थे।
  2. हिंदी के प्रति समर्पण: उन्होंने अपना पूरा जीवन हिंदी भाषा की सेवा और उसके उत्थान में लगा दिया।
✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के की मृत्यु पर लेखक अत्यंत दुःखी थे। उन्हें फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत सुनने जैसा लगता था। उन्हें यह विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना स्नेही और जीवंत व्यक्ति अब उनके बीच नहीं है। उनकी मृत्यु पर रोने वालों की संख्या देखकर लेखक को लगा कि उन नम आँखों को गिनना संभव नहीं है।

✅ Model Answer

भारत आने के बाद फ़ादर बुल्के पत्र व्यवहार के माध्यम से अपने परिवार से संपर्क रखते थे। वे अपनी माँ और परिवार के अन्य सदस्यों को नियमित रूप से पत्र लिखते थे और उनके पत्र आते भी थे। वे अपनी माँ की चिट्ठियों को अक्सर अपने मित्र डॉ. रघुवंश को दिखाते थे।

📌 दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (Long Answer Questions)
✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के वास्तव में एक सच्चे कर्मयोगी थे। कर्मयोगी वह होता है जो फल की चिंता किए बिना अपने कर्म को पूरी निष्ठा से करता है। फ़ादर बुल्के ने भारत को और हिंदी भाषा को अपनी कर्मभूमि चुना। उन्होंने पूरी लगन से हिंदी सीखी, उस पर शोध किया, शब्दकोश बनाया और उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष किया। यह सब उन्होंने किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य और प्रेम के कारण किया। वे लोगों से रिश्ते भी एक कर्मयोगी की तरह ही निभाते थे - पूरी निष्ठा से, बिना किसी अपेक्षा के। उनका जीवन कर्म की साधना का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

✅ Model Answer

लेखक सर्वेश्वरदयाल सक्सेना और फ़ादर बुल्के के बीच एक गहरा और आत्मीय संबंध था। यह संबंध केवल एक लेखक और एक विद्वान का नहीं, बल्कि छोटे और बड़े भाई जैसा था। फ़ादर बुल्के लेखक के घर के हर कार्यक्रम में शामिल होते थे, चाहे वह बच्चे का अन्नप्राशन हो या कोई और खुशी का मौका। वे लेखक के दुःख में भी सहभागी होते थे और अपनी सांत्वना से उन्हें हिम्मत देते थे। 'परिमल' की गोष्ठियों में उनकी साहित्यिक चर्चाएँ होती थीं। लेखक फ़ादर की हर छोटी-बड़ी बात से परिचित थे, जैसे उनकी साइकिल, उनका पहनावा, और उनकी आदतें। फ़ादर की मृत्यु के बाद लेखक का यह कहना कि "फ़ादर को याद करना एक उदास शांत संगीत को सुनने जैसा है," उनके गहरे और भावनात्मक संबंध को ही प्रकट करता है।

📌 मूल्य-आधारित प्रश्न (Value-Based Question)
✅ Model Answer

फ़ादर बुल्के के इस कथन से अपनी जन्मभूमि के प्रति उनका गहरा प्रेम और सम्मान प्रकट होता है। भले ही उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बना लिया था, लेकिन वे अपनी जड़ों को नहीं भूले थे। यह उनके संतुलित और कृतज्ञ व्यक्तित्व को दर्शाता है।

इससे हमें यह प्रेरणा मिलती है कि हमें भी अपनी मातृभूमि का सम्मान करना चाहिए, चाहे हम कहीं भी रहें। हमें अपनी संस्कृति, भाषा और परंपराओं पर गर्व होना चाहिए और उनके विकास में योगदान देना चाहिए। जैसे फ़ादर ने भारत को अपनाया, वैसे ही हमें अपनी जड़ों से जुड़े रहकर विश्व बंधुत्व की भावना को भी अपनाना चाहिए।

Common Mistakes to Avoid

01
🔄
Confusing Facts
Students often mix up details like where Father Bulke did his M.A. (Allahabad) or his PhD topic. Create a small fact-sheet to avoid this.
02
🔍
Superficial Answers
Simply writing "He loved Hindi" is not enough. You must provide specific examples from the text, like his dictionary work, his PhD, and his arguments in 'Parimal'.
03
👶🏻
Misunderstanding 'Sanyasi'
Not clearly explaining the difference between a traditional Sanyasi and Father Bulke's approach. Remember, he was a Sanyasi of the mind, not in practice of detachment.
04
💬
Ignoring Emotional Tone
This chapter is a memoir (*संस्मरण*). Your answers should reflect the emotional tone of the author's memories, especially in questions about 'Manviya Karuna'.

📚Exam Preparation Tips for 2026-27

01
👤
Character Sketch
Prepare a detailed character sketch of Father Kamil Bulke, covering all aspects of his personality.
02
🌈
Theme Focus
Understand the central theme – 'Manviya Karuna' (human compassion). Practice writing answers around this theme.
03
📝
Key Quotes
Memorize the meaning of key phrases like "नम आँखों को गिनना स्याही फैलाना है" and "उदास शांत संगीत."
04
✏️
Practice Writing
Write answers to the long questions in your own words to improve speed and quality for the board exam.

🅾Frequently Asked Questions (FAQs)

Who was Father Kamil Bulke?
Father Kamil Bulke was a Belgian missionary who came to India and dedicated his life to the service of people and the Hindi language. He is remembered for his compassionate nature and love for Indian culture.
Why is the chapter named 'Manviya Karuna ki Divya Chamak'?
The chapter is named so because the author, Sarveshwar Dayal Saxena, saw Father Bulke as an embodiment of human compassion. His love, kindness, and empathy shone so brightly that it seemed like a divine spark.
What was Father Bulke's most significant contribution to Hindi?
His most significant contributions include his PhD thesis "रामकथा: उत्पत्ति और विकास," creating a reputable English-Hindi dictionary, and his lifelong advocacy for making Hindi the national language of India.
How should I answer questions from this chapter in the board exam?
Start by understanding the question's core demand. Use keywords from the chapter. Support your answer with specific examples and quotes from the text. For long answers, structure them into an introduction, body (with 2-3 points), and a conclusion.

Master मानवीय करुणा की दिव्य चमक ✨

"मानवीय करुणा की दिव्य चमक" is more than just a chapter; it's a lesson in humanity. Understanding Father Bulke's character will not only help you score high marks but also inspire you in your own life. Keep revising the key concepts and practice the questions!

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