NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 12: लखनवी अंदाज़
Welcome, students! This guide for 'Lakhnavi Andaz' will help you master Yashpal's brilliant satire. We provide easy explanations, complete NCERT solutions, and important questions to prepare you for your CBSE Class 10 board exams. Scoring full marks on this chapter is now easier than ever!
Chapter at a Glance
Chapter 12: लखनवी अंदाज़ – Quick Reference
| Chapter Name | Chapter 12: लखनवी अंदाज़ (Lakhnavi Andaz) |
| Author | यशपाल (Yashpal) |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Class / Board | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Important Topics | व्यंग्य (Satire), दिखावे की प्रवृत्ति (Tendency to show off), पतनशील सामंती वर्ग (Decadent feudal class), लेखक का दृष्टिकोण (Author's perspective) |
| Difficulty Level | Easy to Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks |
Learning Objectives
Understand the meaning and purpose of व्यंग्य (satire) in literature.
Analyze the character of the Nawab Sahab and his hollow pride.
Explain the author's critique of an artificial and pretentious lifestyle.
Confidently answer all NCERT Solutions for Class 10 Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) Chapter 12.
Write well-structured answers for board exam questions related to this chapter.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions – All Exercise Questions
जब लेखक ने द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में प्रवेश किया, तो उन्होंने वहाँ पहले से बैठे एक नवाब साहब को देखा। लेखक को निम्नलिखित हाव-भावों से महसूस हुआ कि नवाब साहब उनसे बातचीत करने के लिए उत्सुक नहीं थे:
- चेहरे पर असंतोष का भाव: लेखक को देखते ही नवाब साहब के चेहरे पर असंतोष के भाव उभर आए, मानो लेखक के आने से उनके एकांत में विघ्न पड़ गया हो।
- बातचीत में उदासीनता: नवाब साहब ने लेखक से बातचीत करने या उनका स्वागत करने में कोई रुचि नहीं दिखाई। वे मुँह फेरकर खिड़की से बाहर देखने लगे।
- अनदेखा करना: उन्होंने लेखक की उपस्थिति को पूरी तरह से अनदेखा कर दिया, जिससे डिब्बे में एक अजीब और असुविधाजनक माहौल बन गया। इस ठंडे और उदासीन व्यवहार से लेखक को यह स्पष्ट हो गया कि उनका आगमन पसंद नहीं किया गया।
नवाब साहब ने अपनी रईसी और नवाबी अंदाज़ को दिखाने के लिए बहुत यत्न से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका और अंत में केवल सूँघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया।
यह कार्य उनके निम्नलिखित स्वभावों को इंगित करता है:
- दिखावा (Pretentiousness): वे लेखक को यह दिखाना चाहते थे कि वे आम लोगों से ऊपर हैं जो खीरे जैसी साधारण चीज़ खाते हैं। उनका यह कार्य बताता है कि उन जैसे नवाबों के लिए केवल सुगंध ही संतुष्टि के लिए पर्याप्त है।
- खोखला अभिमान: यह उनकी झूठी शान और उच्च वर्ग की छवि बनाए रखने की इच्छा को दर्शाता है, भले ही यह कार्य स्वयं में अतार्किक और व्यर्थ था। उन्होंने दिखावे के लिए खाने के साधारण आनंद का त्याग कर दिया।
- बनावटी जीवन-शैली: यह व्यवहार एक बनावटी और दिखावे से भरी जीवन-शैली की ओर इशारा करता है, जहाँ वास्तविकता से अधिक दिखावा महत्वपूर्ण है। वे पतनशील सामंती वर्ग का एक प्रमुख उदाहरण हैं, जो अपने अतीत के गौरव के प्रतीकों से चिपके रहते हैं।
यह प्रश्न कहानी की अंतिम पंक्ति से संबंधित है, जहाँ लेखक सोचते हैं कि क्या बिना किसी विचार, घटना और पात्रों के कहानी लिखी जा सकती है, ठीक वैसे ही जैसे नवाब साहब का पेट केवल भोजन के विचार से भर गया।
मैं यशपाल के इस विचार से व्यंग्यात्मक या प्रतीकात्मक अर्थ में सहमत हूँ। इसका विश्लेषण इस प्रकार है:
- परंपरागत दृष्टिकोण: परंपरागत रूप से, एक कहानी को पूर्ण और सार्थक होने के लिए एक कथानक (घटना), पात्रों (पात्र) और एक मूल विचार (विचार) की आवश्यकता होती है।
- यशपाल का व्यंग्यात्मक बिंदु: यशपाल यहाँ सचमुच यह सुझाव नहीं दे रहे हैं कि कहानियाँ हवा में लिखी जा सकती हैं। वे इस विचार का उपयोग एक व्यंग्य (satire) के रूप में कर रहे हैं। उनका तात्पर्य है कि यदि कोई नवाब केवल खीरे की गंध से "ज्ञानोदय" और "तृप्ति" का अनुभव कर सकता है, तो शायद एक लेखक भी ऐसी ही महत्वहीन घटना से "नई कहानी" का विचार प्राप्त कर सकता है।
- 'नई कहानी' आंदोलन: यह पंक्ति हिंदी साहित्य के 'नई कहानी' आंदोलन की ओर भी सूक्ष्म रूप से इशारा करती है, जहाँ लेखक बड़े कथानकों के बजाय मनोवैज्ञानिक स्थितियों, क्षणों और सूक्ष्म अवलोकनों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते थे। "लखनवी अंदाज़" स्वयं इसका एक आदर्श उदाहरण है - यह एक बड़ी घटना पर नहीं, बल्कि एक पात्र के व्यवहार के सरल लेकिन गहरे अवलोकन पर आधारित कहानी है।
अतः, जबकि एक कहानी को अपने मूल तत्वों की आवश्यकता होती है, यशपाल चतुराई से यह सुझाव देते हैं कि प्रेरणा और अर्थ सबसे तुच्छ और बेतुकी स्थितियों में भी मिल सकते हैं।
Extra Board Exam Questions (2026-27)
लेखक ने सेकंड क्लास का टिकट इसलिए खरीदा क्योंकि वे एकांत में एक नई कहानी के बारे में सोचना चाहते थे। उन्हें यह भी लगा कि सेकंड क्लास का डिब्बा खाली होगा और वे खिड़की से प्राकृतिक दृश्य देखते हुए आराम से अपनी यात्रा कर सकेंगे।
नवाब साहब ने "आदाब-अर्ज़, जनाब, खीरे का शौक़ फरमाएँगे?" कहकर लेखक को आमंत्रित किया। लेखक ने आत्मसम्मान के कारण मना कर दिया क्योंकि शुरू में नवाब साहब ने उनसे बात करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।
जब लेखक ने देखा कि नवाब साहब केवल खीरे को सूँघने मात्र से संतुष्टि और डकार का अनुभव कर सकते हैं, तो उनके "ज्ञान-चक्षु खुल गए"। उन्हें यह विचार आया कि यदि गंध से पेट भर सकता है, तो बिना विचार, घटना और पात्र के भी 'नई कहानी' क्यों नहीं लिखी जा सकती।
'लखनवी अंदाज़' शीर्षक कहानी के लिए पूरी तरह से उपयुक्त और सार्थक है। यह शीर्षक कहानी के केंद्रीय भाव को दर्शाता है, जो है लखनऊ के नवाबों की विशेष जीवन-शैली, नज़ाकत और दिखावे की प्रवृत्ति। कहानी में नवाब साहब का हर कार्य, जैसे खीरे को करीने से काटना, नमक-मिर्च लगाना और फिर केवल सूँघकर फेंक देना, उनके 'लखनवी अंदाज़' को ही प्रदर्शित करता है। यह शीर्षक उस पतनशील सामंती वर्ग पर एक सटीक व्यंग्य है जो अपनी झूठी शान बनाए रखने के लिए हास्यास्पद हरकतें करता है।
कहानी के नवाब साहब 'पतनशील सामंती वर्ग' के प्रतिनिधि हैं। वे दिखावा पसंद, अभिमानी और बनावटी जीवन जीने वाले व्यक्ति हैं। ट्रेन में लेखक का आना उन्हें पसंद नहीं आता। वे अपनी नवाबी शान दिखाने के लिए खीरे जैसी साधारण वस्तु को भी खाने का एक रईसी तरीका इजाद करते हैं। उनका खीरे को सूँघकर फेंक देना उनके खोखले आत्म-सम्मान और झूठी शान का प्रतीक है। वे वास्तविकता से दूर, केवल अपनी नवाबी की एक छवि में जीना चाहते हैं।
- नवाब साहब की भाव-भंगिमा उनके किस स्वभाव को दर्शाती है?
उत्तर: नवाब साहब की यह भाव-भंगिमा, जैसे स्वाद के आनंद में आँखें बंद कर लेना और पानी का घूँट गले से उतारना, उनके अत्यंत नाटकीय और दिखावटी स्वभाव को दर्शाती है। वे यह प्रदर्शित करना चाहते थे कि वे इतने कोमल और नाज़ुक हैं कि वस्तु के स्वाद की कल्पना मात्र से ही तृप्त हो जाते हैं।
- नवाब साहब ने खीरे की फाँक को बाहर क्यों फेंक दिया?
उत्तर: नवाब साहब ने अपनी 'खानदानी रईसी' और 'नवाबी अंदाज़' दिखाने के लिए खीरे की फाँक को बाहर फेंक दिया। वे लेखक के सामने यह साबित करना चाहते थे कि वे खीरे जैसी आम चीज़ नहीं खाते, बल्कि उनका स्तर इतना ऊँचा है कि वे केवल उसकी सुगंध से ही काम चला लेते हैं। यह उनके अहंकार और दिखावे की पराकाष्ठा थी।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master लखनवी अंदाज़ 🌍
"लखनवी अंदाज़" is a short but powerful chapter that teaches us to be authentic and reject pretense. Understanding the satire behind the Nawab's actions is the key to mastering this chapter. We hope these solutions and extra questions will boost your confidence for the Board Exam 2026-27.
⚡ Practice Chapter 12 MCQs Free