NCERT Solutions for Class 10 Hindi Chapter 11: बालगोबिन भगत
Welcome, students! This guide provides detailed NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kshitij Chapter 11, बालगोबिन भगत. We'll explore the unique character of Balgobin Bhagat, his beliefs, and the chapter's deep social messages. Understanding this chapter is crucial for scoring well in your CBSE board exams. Let's begin!
Chapter at a Glance
Chapter 11: बालगोबिन भगत – Quick Reference
| Chapter Name | बालगोबिन भगत (Balgobin Bhagat) |
| Subject | Hindi Course A – Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Class | 10 |
| Board | CBSE |
| Author | रामवृक्ष बेनीपुरी (Ramvriksh Benipuri) |
| Important Topics | Character Sketch, Social Norms, True Meaning of a 'Sadhu', Bhakti Tradition |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 3–5 Marks (Part of the Prose Section) |
Key Facts – Quick Points to Memorise
Learning Objectives
Understand the character sketch (चरित्र-चित्रण) of Balgobin Bhagat.
Differentiate between a true ascetic (साधु) and a person who just looks like one.
Analyze the social commentary on outdated traditions.
Appreciate the literary style of a 'रेखाचित्र' (pen-sketch).
Explain the influence of Kabir's teachings on Balgobin Bhagat.
Key Concepts & Definitions
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - Practice & Self-Test
व्याख्या: भगत कबीर के आदर्शों पर चलते थे और उन्हें ही अपना 'साहब' मानते थे।
व्याख्या: वे मृत्यु को शोक का नहीं, बल्कि उत्सव का अवसर मानते थे।
व्याख्या: उनकी वेशभूषा बहुत ही साधारण थी, और वे सर्दियों में बस एक काली कमली ओढ़ते थे।
व्याख्या: उस दिन भी वे पूरी तल्लीनता से गा रहे थे, जो उनकी साधना का चरम उत्कर्ष था।
व्याख्या: भगत भोर में जो गीत गाते थे, उन्हें 'प्रभाती' कहा जाता है।
Full NCERT Solutions – पाठ्यपुस्तक के प्रश्न-अभ्यास
बालगोबिन भगत एक गृहस्थ थे, लेकिन उनका आचरण और व्यवहार साधुओं जैसा था। निम्नलिखित चारित्रिक विशेषताओं के कारण वे साधु कहलाते थे:
- कबीर के अनुयायी: वे कबीर के आदर्शों पर चलते थे और उन्हीं के पद गाते थे। वे किसी भी प्रकार के कर्मकांड और मूर्ति-पूजा में विश्वास नहीं करते थे।
- सत्यवादी और खरा व्यवहार: वे हमेशा सच बोलते थे और सबसे स्पष्ट व्यवहार करते थे। वे किसी की चीज़ को बिना पूछे नहीं छूते थे और न ही बिना वजह किसी से झगड़ते थे।
- निस्वार्थ और संतोषी: वे अपनी उपज को सबसे पहले कबीरपंथी मठ ले जाते थे। वहाँ से जो 'प्रसाद' के रूप में मिलता था, उसी से अपना गुज़ारा करते थे। इससे उनका निस्वार्थ और संतोषी स्वभाव पता चलता है।
- मोह-माया से दूर: अपने बेटे की मृत्यु पर भी उन्होंने शोक नहीं मनाया, बल्कि उसे आत्मा का परमात्मा से मिलन का 'उत्सव' कहा। यह दर्शाता है कि वे सांसारिक मोह-माया से ऊपर उठ चुके थे।
इन्हीं गुणों के कारण, वे वेशभूषा से नहीं, बल्कि अपने कर्म और आचरण से साधु थे।
भगत की पुत्रवधू उन्हें अकेले इसलिए नहीं छोड़ना चाहती थी क्योंकि:
- बुढ़ापे का सहारा: भगत अब बूढ़े हो चुके थे और उनके इकलौते बेटे की भी मृत्यु हो चुकी थी। पुत्रवधू को चिंता थी कि बुढ़ापे में उनकी देखभाल कौन करेगा।
- सेवा की भावना: वह उनकी सेवा करना अपना कर्तव्य समझती थी। वह चाहती थी कि उनके लिए भोजन बनाए, उन्हें समय पर दवा दे और उनकी हर ज़रूरत का ख्याल रखे।
- पारिवारिक दायित्व: पति की मृत्यु के बाद, वह अपने ससुर के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी को निभाना चाहती थी। वह उन्हें अकेला और असहाय छोड़कर नहीं जाना चाहती थी।
भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर आम लोगों की तरह शोक या विलाप नहीं किया। इसके विपरीत, उन्होंने अपनी भावनाओं को बहुत ही अनोखे और दार्शनिक ढंग से व्यक्त किया:
- उन्होंने मृत बेटे के शरीर को एक चटाई पर लिटाकर उसे सफेद चादर से ढक दिया।
- उसके पास बैठकर वे उसी तल्लीनता से कबीर के पद गाने लगे, जैसे रोज़ गाते थे।
- उन्होंने अपनी रोती हुई पुत्रवधू को भी चुप कराया और कहा कि यह रोने का नहीं, बल्कि उत्सव मनाने का समय है, क्योंकि एक 'विरहणी आत्मा' अपने 'प्रेमी परमात्मा' से जा मिली है।
- इस प्रकार, उन्होंने मृत्यु को एक दुखद घटना न मानकर आत्मा के परमात्मा से मिलन का एक आनंदमय अवसर माना।
व्यक्तित्व: बालगोबिन भगत का व्यक्तित्व एक सच्चे साधु का था। वे लगभग साठ वर्ष के, गोरे-चिट्टे और मँझोले कद के व्यक्ति थे। उनके बाल पक चुके थे। वे स्वभाव से अत्यंत सीधे-सादे, सत्यवादी और संतोषी थे। वे कबीर के आदर्शों में गहरी आस्था रखते थे और सांसारिक मोह-माया से दूर थे। उनका संगीत प्रेम और ईश्वर में अटूट विश्वास उनके व्यक्तित्व को और भी प्रभावशाली बनाता था।
वेशभूषा: उनकी वेशभूषा भी बहुत साधारण थी। वे कमर में एक लँगोटी और सिर पर कबीरपंथियों जैसी कनफटी टोपी पहनते थे। सर्दियों में, वे बस एक काली कमली ओढ़ लेते थे। उनके माथे पर हमेशा एक रामानंदी चंदन का टीका लगा होता था, जो नाक के एक छोर से शुरू होता था। गले में वे तुलसी की जड़ों की एक बेडौल माला पहने रहते थे।
बालगोबिन भगत की दिनचर्या उनके दृढ़ संकल्प, अनुशासन और आत्म-संयम को दर्शाती थी, जो लोगों के लिए अचरज का कारण थी। उनकी दिनचर्या की कुछ विशेष बातें थीं:
- नियमितता: वे हर मौसम में, चाहे सर्दी हो या गर्मी, भोर में उठकर गाँव से दो मील दूर नदी में स्नान करने जाते थे।
- प्रभाती गायन: स्नान के बाद वे गाँव के बाहर एक पोखर के ऊँचे स्थान पर बैठकर खँजड़ी बजाते हुए भक्ति गीत गाते थे। कड़ाके की ठंड में भी उनका यह नियम नहीं टूटता था।
- अनुशासन: खेती-बाड़ी के काम और घर के अन्य दायित्वों को भी वे पूरी लगन से निभाते थे।
- अटूट नियम: उनकी यह अनुशासित दिनचर्या सालों-साल बिना किसी बदलाव के चलती रही, जो आम लोगों के लिए हैरान करने वाली बात थी।
बालगोबिन भगत के गायन में एक अद्भुत जादू था। उनकी विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- सजीवता: उनके स्वर में इतनी सजीवता थी कि सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते थे।
- माहौल बनाने की क्षमता: जब वे धान की रोपाई के समय गाते थे, तो बच्चे, औरतें और मर्द सभी उनके स्वर की लहर में झूमने लगते थे। हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते थे और रोपनी करने वालों की उँगलियाँ एक अजीब क्रम में चलने लगती थीं।
- ईश्वरीय प्रभाव: उनका गायन सीधे ईश्वर को समर्पित होता था। ऐसा लगता था मानो उनका कंठ-संगीत ईश्वर तक पहुँच रहा हो।
- मौसम से परे: भादों की अँधेरी रात हो या कार्तिक की सुबह, उनके गायन में वही तल्लीनता और मिठास बनी रहती थी। उनका संगीत सुनने वालों को एक अलग ही दुनिया में ले जाता था।
बालगोबिन भगत ने अपने कार्यों से कई बार प्रचलित सामाजिक मान्यताओं का खंडन किया। पाठ में आए ऐसे मार्मिक प्रसंग निम्नलिखित हैं:
- पुत्र को मुखाग्नि: हिंदू परंपरा के अनुसार, मृत शरीर को मुखाग्नि पुरुष (आमतौर पर पुत्र) ही देता है। लेकिन भगत ने अपने बेटे के मृत शरीर को मुखाग्नि अपनी पुत्रवधू से दिलवाई। यह स्त्री-पुरुष समानता और रूढ़ियों पर एक बड़ा प्रहार था।
- पुत्रवधू का पुनर्विवाह: उस समय विधवा विवाह को समाज में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। इसके बावजूद, भगत ने श्राद्ध की अवधि पूरी होते ही अपनी पुत्रवधू के भाई को बुलाकर उसका पुनर्विवाह करवाने का आदेश दिया। उन्होंने अपनी पुत्रवधू के भविष्य की चिंता की और उसे एक नई ज़िंदगी देने का प्रगतिशील कदम उठाया।
- श्राद्ध और कर्मकांड का विरोध: उन्होंने बेटे की मृत्यु पर शोक मनाने की जगह उत्सव मनाया और किसी भी प्रकार के पारंपरिक श्राद्ध या कर्मकांड में विश्वास नहीं जताया, जो कबीरपंथी विचारधारा के अनुरूप था।
आषाढ़ के महीने में जब रिमझिम फुहारों के बीच धान की रोपाई चलती थी, तब बालगोबिन भगत का संगीत पूरे माहौल में जादू बिखेर देता था।
उस समय का शब्द-चित्र इस प्रकार है:
आसमान बादलों से घिरा है और ठंडी हवा चल रही है। गाँवों में बच्चे पानी भरे खेतों में उछल-कूद कर रहे हैं। औरतें कलेवा लेकर मेड़ पर बैठी हैं और किसान धान के पौधे रोप रहे हैं। ठीक इसी समय, बालगोबिन भगत के कंठ से फूटता हुआ मधुर संगीत कानों में पड़ता है। वे कीचड़ में लथपथ होकर अपने खेत में रोपनी कर रहे हैं और साथ में पूरी तल्लीनता से गा रहे हैं।
उनके संगीत में ऐसा जादू है कि काम कर रहे लोगों की उँगलियाँ एक लय में चलने लगती हैं, हलवाहों के पैर ताल से उठने लगते हैं और बच्चे भी झूम उठते हैं। मेड़ पर बैठी औरतें भी अनजाने में गुनगुनाने लगती हैं। ऐसा लगता है मानो भगत का संगीत केवल मनुष्यों को ही नहीं, बल्कि उस पूरे प्राकृतिक परिवेश को भी जीवंत कर रहा है।
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बालगोबिन भगत के दैनिक जीवन से हमें अनुशासन, आत्म-संयम, और अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा की प्रेरणा मिलती है। वे हर मौसम में अपने नियमों का दृढ़ता से पालन करते थे, जो हमें सिखाता है कि जीवन में सफलता के लिए अनुशासन अत्यंत आवश्यक है।
इस कथन का आशय है कि भगत ने साधुओं जैसा आचरण और विचार तो अपना लिया था, लेकिन उन्होंने संन्यासियों की तरह घर-परिवार नहीं त्यागा था। वे खेती-बाड़ी करते थे, परिवार की ज़िम्मेदारियाँ निभाते थे, और एक गृहस्थ जीवन जीते हुए भी साधुता के मार्ग पर चलते थे।
लेखक बालगोबिन भगत के मधुर गायन, उनके साधु जैसे आचरण, उनकी सादगी और सामाजिक रूढ़ियों पर उनके द्वारा किए गए प्रहार से बहुत प्रभावित था। एक गृहस्थ होते हुए भी उनका मोह-माया से परे जीवन लेखक को मुग्ध कर देता था।
भगत ने अपनी पुत्रवधू के भाई से कहा कि वह अभी जवान है और उसका पूरा जीवन उसके सामने है। पति की मृत्यु के बाद उसे अकेले रहकर कष्ट भोगने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए उसका पुनर्विवाह कर देना चाहिए ताकि वह एक सुखी जीवन जी सके। यह उनके प्रगतिशील और मानवीय दृष्टिकोण को दर्शाता है।
कार्तिक मास आते ही बालगोबिन भगत की प्रभातियाँ शुरू हो जाती थीं। वे भोर में उठकर नदी-स्नान के लिए जाते और लौटकर पोखर के ऊँचे भिंडे पर अपनी खँजड़ी लेकर बैठ जाते। फिर वे अपने मधुर स्वर में प्रभाती गाना शुरू कर देते, जो फाल्गुन मास तक चलता था।
'बालगोबिन भगत' पाठ के आधार पर यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि वे एक सच्चे समाज सुधारक थे। उन्होंने अपने कथनों से नहीं, बल्कि अपने कार्यों से समाज में व्याप्त कुरीतियों का विरोध किया।
- पहला उदाहरण उनके बेटे की मृत्यु के समय देखने को मिलता है। उन्होंने न केवल बेटे की मृत्यु पर शोक मनाने की परंपरा को तोड़ा, बल्कि अपनी पुत्रवधू से मुखाग्नि दिलवाकर समाज की उस रूढ़िवादी परंपरा को चुनौती दी जो स्त्री को यह अधिकार नहीं देती।
- दूसरा और सबसे सशक्त उदाहरण विधवा पुनर्विवाह का है। उस युग में जब विधवाओं का जीवन अत्यंत कष्टमय होता था, भगत ने अपनी पुत्रवधू के भविष्य के बारे में सोचा। उन्होंने उसके भाई को बुलाकर साफ़-साफ़ कह दिया कि इसकी दूसरी शादी कर देना। यह एक बहुत बड़ा और क्रांतिकारी कदम था, जो उनकी गहरी मानवीय संवेदना और सुधारवादी सोच को प्रमाणित करता है।
अतः, बालगोबिन भगत केवल एक भक्त या साधु ही नहीं, बल्कि अपने आचरण से समाज को नई दिशा दिखाने वाले एक सच्चे समाज सुधारक भी थे।
बालगोबिन भगत के चरित्र की कई विशेषताओं ने मुझे प्रभावित किया, जिनमें से प्रमुख निम्नलिखित हैं:
- कर्तव्यनिष्ठा और वैराग्य का संतुलन: मुझे सबसे अधिक इस बात ने प्रभावित किया कि वे एक सफल गृहस्थ भी थे और एक सच्चे वैरागी भी। उन्होंने कभी अपने कर्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ा, लेकिन साथ ही वे सांसारिक मोह-माया से पूरी तरह मुक्त थे। यह संतुलन आज के जीवन के लिए एक बड़ी सीख है।
- सच्ची ईश्वर-भक्ति: उनकी भक्ति दिखावे की नहीं थी। वे किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं करते थे, बल्कि संगीत और अपने कर्मों के माध्यम से ईश्वर को याद करते थे। उनकी भक्ति में आडंबर नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा थी।
- प्रगतिशील सोच: जिस प्रकार उन्होंने विधवा पुनर्विवाह का समर्थन किया और स्त्री-पुरुष समानता का संदेश दिया, वह उनकी आधुनिक और प्रगतिशील सोच को दर्शाता है। वे समय से बहुत आगे की सोच रखते थे।
इन गुणों के कारण बालगोबिन भगत का चरित्र अत्यंत प्रेरणादायक और अनुकरणीय बन जाता है।
- 'संझा' से क्या तात्पर्य है? वह शाम को शीतल कैसे करती थी?
उत्तर: 'संझा' से तात्पर्य शाम के समय गाए जाने वाले भक्ति-गीतों से है। बालगोबिन भगत के संगीत में इतनी शीतलता और शांति थी कि वह गर्मियों की उमसभरी शाम में भी सुनने वालों को ठंडक और सुकून का अहसास कराती थी। - भगत की 'प्रेमी-मंडली' उनके संगीत में किस प्रकार भाग लेती थी?
उत्तर: भगत की 'प्रेमी-मंडली' उनके संगीत में पूरे उत्साह से भाग लेती थी। जब भगत एक पद गाते, तो उनकी मंडली उस पद को दुहराती और तिहराती थी। वे खँजड़ी और करताल बजाकर संगीत में ताल देते थे, जिससे पूरा माहौल संगीतमय हो जाता था। - "धीरे-धीरे मन तन पर हावी हो जाता।" इस पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: इस पंक्ति का आशय है कि संगीत का प्रभाव इतना गहरा होता था कि लोग अपनी शारीरिक सुध-बुध खो बैठते थे। उनका मन संगीत की लहरियों में इतना डूब जाता था कि वे अपने शरीर के कष्ट, थकान और आसपास के माहौल को भूलकर पूरी तरह से संगीत में लीन हो जाते थे। अंततः, उनका शरीर भी मन के साथ झूमने और नाचने लगता था।
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Frequently Asked Questions (FAQs)
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