Updated NCERT Solutions for Surdas ke Pad Class 10 Hindi | Important Questions (2026-27)
Welcome, students! Get ready to dive into the beautiful world of 'Surdas ke Pad'. This chapter is a masterpiece of Hindi literature. We’ll break down every verse (pad), explore its deep meaning, and prepare you for your board exams. These concepts are also foundational for many competitive exams.
Chapter at a Glance
Chapter 1: सूरदास के पद – Quick Reference
| Chapter Name | पद (Pad) |
| Author | सूरदास (Surdas) |
| Book Name | Kshitij (क्षितिज भाग 2) |
| Subject | Hindi Course A |
| Board / Class | CBSE Class 10 |
| Target Year | 2026-27 |
| Key Topics | Gopi-Uddhav Samvad, Sagun vs. Nirgun Bhakti, Virah Vedna, Rajdharma. |
| Difficulty Level | Medium |
| Exam Weightage | 4–6 Marks |
Learning Objectives
Understand the deep conversation (samvad) between the Gopis and Uddhav.
Explain the main message of each pad (verse) in simple words.
Differentiate between Sagun Bhakti (devotion to a form of God) and Nirgun Bhakti (devotion to a formless God).
Analyze the Gopis' love, wit, and sarcasm (vyangya).
Confidently answer all NCERT questions and important board exam questions from this chapter.
Key Concepts & Definitions
Full NCERT Solutions (Updated for 2026-27)
गोपियों द्वारा उद्धव को 'भाग्यवान' (fortunate) कहने में व्यंग्य (sarcasm) छिपा है। वे वास्तव में उद्धव को भाग्यहीन (unfortunate) मानती हैं। उनके अनुसार, उद्धव बहुत अभागे हैं क्योंकि वे श्री कृष्ण के इतने पास रहकर भी उनके प्रेम के सागर में डूब नहीं पाए। वे प्रेम के उस आनंद को नहीं समझ सके जिसे गोपियाँ अनुभव कर रही हैं। गोपियाँ कहती हैं कि उद्धव उस कमल के पत्ते और तेल की मटकी के समान हैं, जिन पर पानी की एक बूँद भी नहीं ठहरती। इसी तरह, कृष्ण के प्रेम का उद्धव पर कोई असर नहीं हुआ।
गोपियों ने उद्धव के व्यवहार की तुलना दो चीजों से की है:
- कमल के पत्ते से (Purain paat): जिस प्रकार कमल का पत्ता पानी में रहते हुए भी गीला नहीं होता, उसी प्रकार उद्धव कृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम से अछूते हैं।
- तेल की गगरी से (Tel ki gagri): जिस प्रकार तेल से चुपड़ी हुई मटकी को पानी में डुबोने पर भी उस पर पानी की एक बूँद नहीं ठहरती, उसी प्रकार उद्धव पर कृष्ण के प्रेम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
गोपियों ने निम्नलिखित उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने (taunts) दिए हैं:
- वे उद्धव को 'बड़भागी' कहकर ताना मारती हैं, जिसका असली मतलब 'अभागा' है।
- वे उनके योग-संदेश को 'कड़वी ककड़ी' (bitter cucumber) के समान बताती हैं, जिसे वे अपना नहीं सकतीं।
- वे कहती हैं कि उद्धव ने प्रेम रूपी नदी में कभी पैर ही नहीं डुबोया, इसलिए वे प्रेम की पीड़ा नहीं समझ सकते।
- वे उद्धव द्वारा लाए गए योग-संदेश को एक 'बीमारी' (su to byadhi) कहती हैं, जिसके बारे में उन्होंने न कभी देखा, न सुना, और न भोगा है।
गोपियाँ कृष्ण के मथुरा चले जाने के कारण पहले से ही विरह की अग्नि (fire of separation) में जल रही थीं। वे इस उम्मीद में जी रही थीं कि कृष्ण एक दिन लौटकर आएँगे। लेकिन जब कृष्ण ने स्वयं आने के बजाय उद्धव को योग-साधना का निर्गुण संदेश लेकर भेज दिया, तो उनकी आशा टूट गई। यह संदेश उनके लिए कृष्ण के प्रेम-संदेश के स्थान पर आया था। इसने उनकी पीड़ा को और बढ़ा दिया, ठीक वैसे ही जैसे आग में घी डालने पर वह और भड़क उठती है।
'मरजादा न लही' के माध्यम से गोपियाँ प्रेम की मर्यादा (dignity/limit of love) के टूटने की बात कर रही हैं। प्रेम की मर्यादा यह है कि प्रेम के बदले प्रेम दिया जाए। गोपियों ने कृष्ण से सच्चा प्रेम किया और वे बदले में कृष्ण के प्रेम की ही अपेक्षा कर रही थीं। परन्तु कृष्ण ने स्वयं न आकर योग का संदेश भेज दिया, जो गोपियों के अनुसार एक धोखा था। कृष्ण ने प्रेम की मर्यादा का पालन नहीं किया, इसलिए अब गोपियों के लिए भी धैर्य धारण करने की कोई मर्यादा नहीं बची है।
गोपियों ने कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम को निम्नलिखित तरीकों से अभिव्यक्त किया है:
- हारिल की लकड़ी के समान: वे कहती हैं कि जिस प्रकार हारिल पक्षी अपने पंजों में लकड़ी को मजबूती से पकड़े रहता है, उसी प्रकार उन्होंने मन, वचन और कर्म से कृष्ण को अपने हृदय में बसा रखा है।
- चींटी और गुड़ के समान: वे अपनी स्थिति को उन चींटियों के समान बताती हैं जो गुड़ से चिपक जाती हैं और वहीं अपने प्राण त्याग देती हैं, पर उसे छोड़ती नहीं। इसी तरह, वे कृष्ण प्रेम में पूरी तरह डूबी हुई हैं।
- जागते-सोते, दिन-रात: वे कहती हैं कि वे जागते-सोते, सपने में, दिन में और रात में, हर समय 'कान्ह-कान्ह' ही रटती रहती हैं।
गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा ऐसे लोगों को देने की बात कही है जिनका मन चंचल है और एक जगह स्थिर नहीं रहता (जिनके मन चकरी)। गोपियों का कहना है कि उनका मन तो पहले से ही कृष्ण के प्रेम में पूरी तरह से स्थिर और एकाग्र है। उन्हें योग की आवश्यकता नहीं है। योग की आवश्यकता तो उन लोगों को है जिनका मन इधर-उधर भटकता रहता है।
प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण पूरी तरह से नकारात्मक है। वे योग-साधना को व्यर्थ और अनुपयोगी मानती हैं।
- वे योग को 'कड़वी ककड़ी' के समान अरुचिकर मानती हैं।
- वे इसे एक ऐसी 'बीमारी' कहती हैं जिसे उन्होंने पहले कभी नहीं देखा-सुना।
- उनके अनुसार, योग उन लोगों के लिए है जिनका मन अस्थिर है, जबकि उनका मन तो कृष्ण में स्थिर है।
- वे सगुण भक्ति में विश्वास रखती हैं और उनके लिए कृष्ण का प्रेम ही सर्वोपरि है, जिसके सामने ज्ञान और योग का कोई महत्व नहीं है।
गोपियों के अनुसार, एक राजा का परम धर्म (राजधर्म) यह होना चाहिए कि वह अपनी प्रजा को किसी भी प्रकार का दुःख या कष्ट न पहुँचाए। उसे हमेशा अपनी प्रजा की भलाई और सुख का ध्यान रखना चाहिए। गोपियाँ कृष्ण को उनका राजधर्म याद दिलाते हुए कहती हैं कि वे तो राजा बनकर अपनी प्रजा (गोपियों) को ही सता रहे हैं, जो कि अन्याय है।
गोपियों को कृष्ण में निम्नलिखित परिवर्तन दिखाई दिए:
- राजनीति पढ़ लेना: गोपियों को लगता है कि कृष्ण अब मथुरा जाकर बहुत चतुर हो गए हैं और उन्होंने 'राजनीति' सीख ली है, जिसके कारण वे कपटपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं।
- बुद्धि का बढ़ जाना: वे व्यंग्य करती हैं कि कृष्ण की बुद्धि अब पहले से बहुत बढ़ गई है, तभी तो उन्होंने प्रेम के बदले योग का संदेश भेजा है।
- राजधर्म भूल जाना: कृष्ण राजा बनकर अपना राजधर्म भूल गए हैं और अपनी प्रजा (गोपियों) को ही दुःख दे रहे हैं।
इन्हीं बदलावों के कारण गोपियों का कृष्ण पर से विश्वास उठ गया है और वे उनसे अपना मन वापस पा लेने की बात कहती हैं, जिसे कृष्ण मथुरा जाते समय चुरा ले गए थे।
गोपियों के वाक्चातुर्य (wittiness/eloquence) की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
- तर्कशीलता (Logic): गोपियाँ अपने तर्कों से उद्धव की हर बात को काट देती हैं। वे कहती हैं कि योग चंचल मन वालों के लिए है, स्थिर मन वालों के लिए नहीं।
- व्यंग्यात्मकता (Sarcasm): वे उद्धव को 'बड़भागी' कहकर और कृष्ण के 'राजनीति पढ़ लेने' की बात कहकर गहरा व्यंग्य करती हैं।
- भावनात्मकता (Emotional Appeal): वे अपनी विरह-वेदना और कृष्ण के प्रति अनन्य प्रेम का भावपूर्ण वर्णन करके उद्धव को निरुत्तर कर देती हैं।
- उपमाओं का प्रयोग (Use of Metaphors): वे कड़वी ककड़ी, हारिल की लकड़ी, और कमल के पत्ते जैसे सटीक उदाहरण देकर अपनी बात को प्रभावशाली बनाती हैं।
- स्पष्टवादिता (Frankness): वे बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात सीधे-सीधे कह देती हैं।
इन विशेषताओं के कारण ही ज्ञानी उद्धव गोपियों के सरल किंतु तर्कपूर्ण सवालों के सामने निरुत्तर हो जाते हैं।
सूरदास के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ इस प्रकार हैं:
- सगुण भक्ति की स्थापना: भ्रमरगीत का मुख्य उद्देश्य निर्गुण ब्रह्म पर सगुण भक्ति की विजय दिखाना है।
- वियोग श्रृंगार का उत्कृष्ट वर्णन: इसमें गोपियों की विरह-वेदना का बहुत ही मार्मिक और सजीव चित्रण किया गया है।
- गोपियों का वाक्चातुर्य: गोपियाँ केवल भावुक नहीं, बल्कि तर्कशील और वाक्-चतुर हैं। वे अपने तर्कों से उद्धव के ज्ञान को परास्त कर देती हैं।
- प्रकृति का उपयोग: गोपियों ने अपनी बात कहने के लिए कमल के पत्ते, तेल की गगरी, हारिल पक्षी जैसे प्राकृतिक उपमानों का सुन्दर प्रयोग किया है।
- सरल और मधुर ब्रजभाषा: पदों की भाषा अत्यंत सरल, स्वाभाविक और संगीत से परिपूर्ण ब्रजभाषा है, जो सीधे हृदय को छूती है।
- उपमालंकार और व्यंग्य का प्रयोग: सूरदास जी ने उपमाओं और व्यंग्य का बहुत ही कुशलता से प्रयोग करके काव्य को और भी प्रभावशाली बना दिया है।
Extra Important Questions (Board Style 2026-27)
Explanation: Gopis found the message of 'yog' as bitter and unappealing as a bitter cucumber.
Explanation: The Gopis hold onto Krishna for support, just as the Haril bird holds onto a piece of wood.
Explanation: Gopis sarcastically say that Krishna has learned politics in Mathura, which is why he is playing games with their hearts.
Explanation: Gopis suggest that 'Yog' is for those whose minds are not stable ('jinke mann chakri'), unlike theirs, which is fixed on Krishna.
Explanation: 'Madhukar' literally means bee (भौंरा), but in the poem, the Gopis use it to indirectly address and taunt Uddhav.
गोपियों को उद्धव का संदेश इसलिए पसंद नहीं आया क्योंकि वे कृष्ण के प्रेम-संदेश की प्रतीक्षा कर रही थीं, न कि ज्ञान और योग के सूखे संदेश की। यह संदेश उनकी विरह की पीड़ा को कम करने के बजाय और बढ़ा रहा था।
गोपियों ने अपनी तुलना गुड़ से चिपकी चींटियों से इसलिए की है ताकि वे अपने एकनिष्ठ और अनन्य प्रेम को दर्शा सकें। जिस प्रकार चींटियाँ गुड़ को नहीं छोड़तीं, चाहे उनके प्राण ही क्यों न चले जाएँ, उसी प्रकार गोपियाँ भी किसी भी हाल में कृष्ण को नहीं छोड़ सकतीं।
इस पंक्ति का आशय यह है कि उद्धव ने कभी किसी से प्रेम नहीं किया। गोपियाँ व्यंग्य करते हुए कहती हैं कि उद्धव प्रेम रूपी नदी के पास रहते हुए भी उसमें कभी उतरे ही नहीं। इसीलिए वे प्रेम की गहराई और उसमें डूबने वालों की पीड़ा को नहीं समझ सकते।
गोपियाँ अपना मन वापस इसलिए पाना चाहती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि कृष्ण अब बदल गए हैं। वे राजनीति सीखकर अनीति पर उतर आए हैं और अपना राजधर्म भी भूल गए हैं। ऐसे अन्यायी और बदले हुए कृष्ण से प्रेम करने का कोई अर्थ नहीं है, इसलिए वे अपना मन वापस चाहती हैं।
उद्धव गोपियों को समझाने में इसलिए असफल रहे क्योंकि वे ज्ञान और तर्क की बातें कर रहे थे, जबकि गोपियों का आधार प्रेम और भावना थी। उद्धव का निर्गुण ज्ञान गोपियों के सगुण प्रेम की दृढ़ता के सामने टिक नहीं सका। गोपियों के वाक्चातुर्य, तर्कों और भावनात्मक अपील के सामने उद्धव निरुत्तर हो गए।
सूरदास के पदों में गोपियों का कृष्ण के प्रति प्रेम एकनिष्ठ, गहरा और अनन्य है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:
- एकनिष्ठता: गोपियों का प्रेम केवल कृष्ण के लिए है। वे योग जैसे किसी दूसरे मार्ग को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं। उनका मन कृष्ण में ही रमा हुआ है।
- समर्पण: वे मन, वचन और कर्म से कृष्ण को समर्पित हैं। वे अपनी तुलना गुड़ से लिपटी चींटी से करती हैं, जो प्राण दे देती है पर गुड़ नहीं छोड़ती।
- दृढ़ता: वे उद्धव के ज्ञान और तर्कों से विचलित नहीं होतीं, बल्कि अपने प्रेम के पक्ष में दृढ़ता से खड़ी रहती हैं। वे कृष्ण को हारिल की लकड़ी के समान बताती हैं, जिसे वे कभी नहीं छोड़ सकतीं।
- वाक्चातुर्य: उनका प्रेम उन्हें तर्कशील और वाक्-चतुर बनाता है। वे अपने प्रेम को सही साबित करने के लिए उद्धव जैसे ज्ञानी को भी परास्त कर देती हैं।
- सहजता: उनका प्रेम बनावटी नहीं, बल्कि अत्यंत सहज और स्वाभाविक है। वे कृष्ण के साथ बिताए पलों को याद करती हैं और उनके लौटने की आस में जीती हैं।
यह कथन पूर्णतः सत्य है। सूरदास के पदों में गोपियों का विरह केवल आँसू बहाने तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अपने विरह को सही ठहराने और उद्धव के ज्ञान को काटने के लिए मजबूत तर्क भी प्रस्तुत करती हैं।
- योग की अनुपयोगिता का तर्क: वे तर्क देती हैं कि योग की आवश्यकता उन्हें है जिनका मन चंचल है ('जिनके मन चकरी'), उनका मन तो कृष्ण में स्थिर है। यह एक अकाट्य तर्क है।
- राजधर्म का तर्क: वे कृष्ण को उनका राजधर्म याद दिलाती हैं कि राजा का धर्म प्रजा को सताना नहीं, बल्कि उनके सुख का ध्यान रखना है। यह तर्क उनकी राजनीतिक समझ को भी दर्शाता है।
- प्रेम की मर्यादा का तर्क: वे 'मरजादा न लही' कहकर कृष्ण पर प्रेम की मर्यादा तोड़ने का आरोप लगाती हैं, जो उनके प्रेम की गहरी समझ को दिखाता है।
- उपमानों का तर्कपूर्ण प्रयोग: वे उद्धव को कमल के पत्ते और तेल की गगरी के समान बताकर यह तर्क सिद्ध करती हैं कि उन पर प्रेम का कोई असर नहीं हो सकता।
इस प्रकार, गोपियाँ अपनी भावुकता को अपने तर्कों का आधार बनाकर उद्धव के हर ज्ञान-तर्क को निष्प्रभावी कर देती हैं।
चौथे पद में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं, "हरि हैं राजनीति पढ़ि आए।" उन्हें ऐसा इसलिए लगता है क्योंकि कृष्ण का व्यवहार अब पहले जैसा सरल और प्रेमपूर्ण नहीं रहा, बल्कि कूटनीतिज्ञों जैसा हो गया है।
- कपटपूर्ण व्यवहार: कृष्ण ने स्वयं आने का वादा किया था, लेकिन उन्होंने खुद न आकर उद्धव को योग का संदेश लेकर भेज दिया। गोपियों को यह एक छलावा और कपटपूर्ण चाल लगती है।
- बुद्धि का दुरुपयोग: गोपियों को लगता है कि मथुरा जाकर कृष्ण बहुत अधिक चतुर और बुद्धिमान हो गए हैं और अपनी इसी बढ़ी हुई बुद्धि का प्रयोग वे गोपियों को सताने और भुलाने के लिए कर रहे हैं।
- अन्यायपूर्ण आचरण: वे मानती हैं कि पहले के लोग परोपकार के लिए इधर-उधर भागते थे, लेकिन कृष्ण अब स्वयं दूसरों पर अन्याय कर रहे हैं।
- राजधर्म की अवहेलना: एक राजा होते हुए भी वे अपनी प्रजा (गोपियों) के दुःख का कारण बन रहे हैं, जो राजधर्म के विरुद्ध है।
कृष्ण के इन्हीं बदले हुए व्यवहारों के कारण गोपियों को लगता है कि उन्होंने प्रेम का सीधा-सरल मार्ग छोड़कर राजनीति का टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता अपना लिया है।
मन क्रम बचन नंद-नंदन-उर, यह दृढ़ करि पकरी।
जागत सोवत स्वप्न दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जकरी।
सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी।
सु तौ ब्याधि हमकौ लै आए, देखी सुनी न करी।
यह तौ 'सूर' तिनहि लै सौंपौ, जिनके मन चकरी॥"
(क) गोपियों ने कृष्ण को 'हारिल की लकरी' क्यों कहा है?
गोपियों ने कृष्ण को 'हारिल की लकरी' इसलिए कहा है क्योंकि जिस प्रकार हारिल पक्षी हर समय अपने पंजों में एक लकड़ी को थामे रहता है और उसे कभी नहीं छोड़ता, उसी प्रकार गोपियों ने भी मन, वचन और कर्म से कृष्ण को अपने हृदय में बसा लिया है और वे उन्हें किसी भी कीमत पर छोड़ नहीं सकतीं।
(ख) योग-संदेश गोपियों को कैसा लगता है और क्यों?
योग-संदेश गोपियों को कड़वी ककड़ी के समान लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि यह उन्हें अत्यंत अरुचिकर और ग्रहण करने में असमर्थ लगता है। उनके लिए कृष्ण का प्रेम ही सब कुछ है, और उसके सामने योग का ज्ञान व्यर्थ है।
(ग) गोपियों के अनुसार योग रूपी बीमारी किन्हें सौंपनी चाहिए?
गोपियों के अनुसार, यह योग रूपी बीमारी उन लोगों को सौंपनी चाहिए जिनका मन चंचल है, अस्थिर है और एक स्थान पर नहीं टिकता। उनका मन तो कृष्ण में स्थिर है, इसलिए उन्हें इसकी आवश्यकता नहीं है।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी में पाऊँ न बोरयो, दृष्टि न रूप परागी।
'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी॥"
(क) गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' कहकर क्या व्यंग्य करती हैं?
गोपियाँ उद्धव को 'बड़भागी' (भाग्यशाली) कहकर यह व्यंग्य करती हैं कि वे वास्तव में बहुत अभागे हैं। वे कृष्ण रूपी प्रेम के सागर के पास रहकर भी उसमें डूब नहीं पाए और प्रेम के आनंद से वंचित रह गए।
(ख) उद्धव की तुलना किन दो वस्तुओं से की गई है और क्यों?
उद्धव की तुलना (1) कमल के पत्ते (पुरइनि पात) और (2) तेल की गगरी से की गई है। क्योंकि जिस प्रकार ये दोनों पानी में रहकर भी उससे अप्रभावित रहते हैं, उसी प्रकार उद्धव भी कृष्ण के साथ रहकर उनके प्रेम से अछूते हैं।
(ग) गोपियों ने अपनी दशा की तुलना किससे की है?
गोपियों ने अपनी दशा की तुलना गुड़ से चिपकी हुई चींटियों (गुर चाँटी ज्यौं पागी) से की है। इसका अर्थ है कि वे कृष्ण के प्रेम में इस तरह लिप्त हैं कि वे उन्हें छोड़ नहीं सकतीं, भले ही इसके लिए उन्हें अपने प्राण ही क्यों न देने पड़ें।
Common Mistakes to Avoid
Exam Preparation Tips for 2026-27
Frequently Asked Questions (FAQs)
Master Surdas ke Pad 🌍
'Surdas ke Pad' is not just a chapter; it's an emotion. It teaches us about the depth and power of true devotion. We hope these detailed notes and solutions have made this beautiful chapter easy and interesting for you.
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