CBSE 2026-27 | कृतिका भाग 2

NCERT Solutions for Class 10 Hindi Kritika Chapter 2: जॉर्ज पंचम की नाक

📚 Class 10 CBSE 🌍 Hindi – कृतिका भाग 2 ⚡ 3–4 Marks 🔵 Medium

Welcome, future toppers! This guide breaks down the satirical chapter "जॉर्ज पंचम की नाक" from your Kritika book. We'll explore its deeper meaning, cover all NCERT solutions, and practice important board exam questions. Mastering this chapter is key for scoring well in your Hindi exam and understanding social commentary.

📋Chapter at a Glance

📚

Chapter 2: जॉर्ज पंचम की नाक – Quick Reference

Chapter NameChapter 2 - जॉर्ज पंचम की नाक (George Pancham Ki Naak)
SubjectHindi Course A – Kritika (कृतिका भाग 2)
Class / BoardClass 10 / CBSE
Authorकमलेश्वर (Kamleshwar)
Target Year2026-27
Key TopicsSatire on colonial mindset, Sycophancy of Indian bureaucracy, Symbolism of 'Naak' (Nose) as honor, National pride.
Difficulty LevelMedium (Requires understanding of satire)
Exam Weightage3–4 Marks (Typically one short-answer question)
💡
Important Note
The official CBSE Class 10 Hindi Kritika Chapter 2 is 'जॉर्ज पंचम की नाक', not 'जुलूस'. This guide provides solutions for the correct chapter as per the 2026-27 syllabus.

🎯Learning Objectives

1

Understand the satire (व्यंग्य) on the post-independence Indian system.

2

Analyze the theme of colonial hangover and sycophancy.

3

Explain the symbolic meaning of 'नाक' (nose) as honor and prestige.

4

Confidently answer all NCERT and board-style questions.

5

Appreciate the author's critique of blind worship of foreign figures.

💡Key Concepts & Definitions

व्यंग्य (Satire)
A literary style using humor, irony, or exaggeration to expose and criticize people's foolishness or vices, particularly in the context of politics and society.
औपनिवेशिक मानसिकता
The lingering influence of the British colonial rulers' culture and values on the minds of Indians even after independence.
Colonial Mindset
नौकरशाही (Bureaucracy)
The system of government run by officials. In the chapter, the bureaucracy is shown as inefficient and servile.
मान-सम्मान और प्रतिष्ठा
The central theme represented by the नाक (nose). The loss of the nose from the statue is seen as a loss of national honor in the eyes of the officials.
Honor and Prestige
कायापलट (Transformation)
Refers to the sudden, drastic beautification of Delhi in preparation for the Queen's visit, highlighting misplaced priorities.

📝FULL NCERT SOLUTIONS: जॉर्ज पंचम की नाक

✅ Model Answer

सरकारी तंत्र में जॉर्ज पंचम की नाक लगाने को लेकर जो चिंता और बदहवासी दिखाई देती है, वह उनकी गुलामी और औपनिवेशिक मानसिकता को दर्शाती है। इससे पता चलता है कि:

  1. गुलामी की मानसिकता: वे अधिकारी आज भी आज़ाद भारत में रहकर अंग्रेज़ी हुकूमत की मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए हैं। उनके लिए जॉर्ज पंचम, जिसने भारत पर राज किया, आज भी सम्मान का पात्र है।
  2. चापलूसी और दिखावा: उन्हें देश के सम्मान से ज़्यादा चिंता इस बात की है कि रानी एलिजाबेथ के सामने उनकी नाक (इज़्ज़त) न कट जाए। वे अपनी कुर्सी और पद को बचाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं।
  3. कर्तव्यहीनता: वे अपने वास्तविक कर्तव्यों, जैसे देश का विकास और जनता की भलाई, को भूलकर एक मूर्ति की नाक के पीछे भागे फिर रहे हैं। यह उनकी प्राथमिकता की कमी को दर्शाता है।

संक्षेप में, यह बदहवासी उनकी आत्म-सम्मान की कमी, चापलूसी और खोखली शान को दिखाती है।

✅ Model Answer

रानी एलिजाबेथ के दरज़ी की परेशानी का कारण यह था कि रानी भारत, पाकिस्तान और नेपाल के शाही दौरे पर कौन-से अवसर पर क्या पहनेंगी। उसे यह चिंता थी कि रानी की शानो-शौकत में कोई कमी न रह जाए और उनकी वेशभूषा उनके पद की गरिमा के अनुरूप हो।

उसकी परेशानी को तर्कसंगत ठहराना:

  • व्यावसायिक दृष्टिकोण: एक पेशेवर दरज़ी के लिए, उसका काम ही उसकी पहचान है। रानी का दौरा उसके लिए एक बहुत बड़ा अवसर था। अगर उसके बनाए कपड़े पसंद किए जाते, तो उसका नाम और काम दोनों चमक जाते। इसलिए, उसका चिंतित होना स्वाभाविक था।
  • ज़िम्मेदारी का एहसास: उसे रानी के कपड़ों की पूरी ज़िम्मेदारी दी गई थी। उसे यह सुनिश्चित करना था कि हर देश और हर कार्यक्रम के लिए रानी के पास उपयुक्त पोशाक हो। यह एक बड़ी ज़िम्मेदारी थी, जिसे लेकर परेशान होना तर्कसंगत है।

जबकि भारतीय अधिकारी एक मूर्ति की नाक के लिए परेशान थे, दरज़ी अपने काम और अपनी ज़िम्मेदारी के प्रति चिंतित था। इस दृष्टि से उसकी चिंता अधिकारियों की चिंता से कहीं ज़्यादा तर्कसंगत और स्वाभाविक है।

✅ Model Answer

नई दिल्ली के कायापलट के लिए निम्नलिखित प्रयत्न किए गए होंगे:

  1. साफ-सफाई: पूरी दिल्ली में, विशेषकर उन मार्गों पर जहाँ से रानी को गुज़रना था, बड़े पैमाने पर सफाई अभियान चलाया गया होगा। सड़कों को धोया गया होगा और कूड़ा-करकट हटाया गया होगा।
  2. रंग-रोगन और सजावट: सरकारी इमारतों, ऐतिहासिक स्थलों और सड़कों के किनारे की इमारतों पर नया रंग-रोगन किया गया होगा। सड़कों पर सजावटी लाइटें और झंडे लगाए गए होंगे।
  3. सड़कों की मरम्मत: टूटी-फूटी सड़कों की तुरंत मरम्मत की गई होगी ताकि रानी के काफ़िले को कोई असुविधा न हो।
  4. अतिक्रमण हटाना: सड़कों के किनारे से अवैध अतिक्रमण और ठेलों को हटाया गया होगा ताकि सड़कें चौड़ी और साफ़ दिखें।
  5. सुरक्षा व्यवस्था: सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए होंगे और पूरे शहर को एक किले में तब्दील कर दिया गया होगा।

यह सब इसलिए किया गया ताकि भारत की एक समृद्ध और सुंदर छवि रानी के सामने प्रस्तुत की जा सके, भले ही यह सब अस्थायी और दिखावटी क्यों न हो।

✅ Model Answer

(क) इस प्रकार की पत्रकारिता के बारे में विचार:

आज की पत्रकारिता में चर्चित हस्तियों के निजी जीवन, जैसे उनके कपड़े, खान-पान, और पार्टियों पर ध्यान केंद्रित करने का चलन बढ़ गया है। मेरे विचार में, यह पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों से भटकाव है।

  • सकारात्मक पक्ष: यह लोगों का मनोरंजन करती है और उन्हें उनके पसंदीदा सितारों के जीवन के बारे में जानकारी देती है, जिससे पाठक/दर्शक जुड़े रहते हैं।
  • नकारात्मक पक्ष: यह गंभीर और ज़रूरी मुद्दों जैसे गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, और शिक्षा से ध्यान भटकाती है। यह पत्रकारिता को एक 'ग्लैमर शो' बनाकर रख देती है, जिससे उसका महत्व कम होता है। इसे "पेज-थ्री पत्रकारिता" भी कहा जाता है।

(ख) आम जनता और युवा पीढ़ी पर प्रभाव:

इस तरह की पत्रकारिता का युवा पीढ़ी पर गहरा और अक्सर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है:

  • भौतिकवाद को बढ़ावा: यह युवाओं को ब्रांडेड कपड़ों, महंगी जीवनशैली और बाहरी दिखावे के प्रति आकर्षित करती है।
  • अवास्तविक आदर्श: युवा इन हस्तियों की नकल करने की कोशिश करते हैं और जब वे वैसा जीवन नहीं जी पाते तो उनमें हीन भावना और अवसाद पैदा हो सकता है।
  • मूल्यों का पतन: यह युवाओं को कड़ी मेहनत, शिक्षा और नैतिक मूल्यों के बजाय ग्लैमर और प्रसिद्धि को अधिक महत्व देना सिखाती है।
  • ध्यान का भटकाव: युवा देश और समाज के ज़रूरी मुद्दों पर सोचने के बजाय सतही बातों में उलझे रहते हैं।

इसलिए, पत्रकारिता को संतुलित होना चाहिए और मनोरंजन के साथ-साथ सामाजिक रूप से प्रासंगिक मुद्दों को भी समान महत्व देना चाहिए।

✅ Model Answer

जॉर्ज पंचम की लाट की नाक को पुनः लगाने के लिए मूर्तिकार ने निम्नलिखित यत्न किए:

  1. पत्थर की खोज: सबसे पहले उसने उस पत्थर को खोजने का प्रयास किया जिससे वह मूर्ति बनी थी। इसके लिए उसने पुरातत्व विभाग की फाइलों की छानबीन की, लेकिन कुछ पता नहीं चला। फिर उसने पूरे भारत के पहाड़ों और पत्थर की खानों का दौरा किया, लेकिन वह खास किस्म का पत्थर कहीं नहीं मिला।
  2. नेताओं की मूर्तियों की नाक: जब पत्थर नहीं मिला, तो उसने सुझाव दिया कि देश के महापुरुषों और नेताओं की मूर्तियों में से किसी की नाक काटकर लगा दी जाए। उसने पूरे देश का दौरा किया और दादाभाई नौरोजी से लेकर गांधीजी, पटेल, और भगत सिंह तक की मूर्तियों की नाकों का नाप लिया, लेकिन जॉर्ज पंचम की नाक से सभी नाकें बड़ी निकलीं।
  3. बिहार के शहीदों की नाक: इसके बाद वह 1942 में बिहार सेक्रेटेरिएट के सामने शहीद हुए बच्चों की मूर्तियों के पास पहुँचा, लेकिन उन बच्चों की नाकें भी जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ी थीं।
  4. ज़िंदा नाक लगाने का प्रस्ताव: अंत में, जब कोई उपाय नहीं सूझा, तो उसने एक भयानक और शर्मनाक सुझाव दिया - किसी ज़िंदा व्यक्ति की नाक काटकर लगा दी जाए। इस काम के लिए चालीस करोड़ भारतीयों में से किसी एक की नाक चुनने का निश्चय किया गया।
✅ Model Answer

पाठ में आए व्यवस्था पर चोट करने वाले कुछ अन्य कथन निम्नलिखित हैं:

  1. "शंख इंग्लैंड में बज रहा था, गूँज हिंदुस्तान में आ रही थी।" - यह कथन दिखाता है कि फैसले और घटनाएँ इंग्लैंड में होती थीं, लेकिन उनका सीधा और बड़ा असर भारत पर पड़ता था, जो हमारी परनिर्भरता को दर्शाता है।
  2. "गश्त लगती रही और लाट की नाक चली गई।" - यह कानून-व्यवस्था और सुरक्षा की पोल खोलता है कि इतनी सुरक्षा के बावजूद नाक चोरी हो गई।
  3. "एक की नज़र ने दूसरे से कहा कि यह बताने की ज़िम्मेदारी तुम्हारी है।" - यह सरकारी दफ्तरों में अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने और काम को एक-दूसरे पर टालने की प्रवृत्ति पर व्यंग्य है।
  4. "दिमाग खरोंचे गए और यह तय किया गया कि हर हालत में इस नाक का होना बहुत ज़रूरी है।" - यह दिखाता है कि अधिकारी समस्या के मूल कारण या नैतिकता पर नहीं, बल्कि केवल हुक्म का पालन करने पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे।
  5. "किंतु बड़ी होशियारी से।" - जिंदा नाक लगाने जैसी शर्मनाक घटना को अखबारों द्वारा बड़ी चालाकी से पेश करना, मीडिया की विवशता और दोगलेपन पर एक करारी चोट है।
  6. "यह एक और बड़ा मसला था।" - हर छोटी-बड़ी बात को "मसला" या समस्या बना देना और उस पर लंबी-चौड़ी बैठकें करना, नौकरशाही की कार्यशैली पर व्यंग्य है।
✅ Model Answer

'नाक' शब्द इस पाठ में केवल एक शारीरिक अंग न होकर कई अर्थों में प्रयुक्त हुआ है, जो निम्नलिखित हैं:

  1. इज़्ज़त, मान-सम्मान और प्रतिष्ठा: यह 'नाक' का सबसे प्रमुख और सांकेतिक अर्थ है। "नाक कटना" मुहावरे का अर्थ है इज़्ज़त चली जाना। सरकारी तंत्र जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक को अपनी नाक (इज़्ज़त) से जोड़कर देखता है।
  2. शारीरिक अंग: कहानी में मूर्तिकार जब असली नाक (पत्थर, मूर्ति या ज़िंदा) की बात करता है, तो वहाँ इसका शाब्दिक अर्थ शारीरिक अंग ही है।
  3. अहंकार और बड़प्पन: भारतीय शहीदों और नेताओं की नाक का जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ा होना यह दर्शाता है कि उनका मान-सम्मान और बलिदान जॉर्ज पंचम के दिखावटी बड़प्पन से कहीं ज़्यादा ऊँचा था।
  4. पराधीनता का प्रतीक: जॉर्ज पंचम की नाक गुलामी और औपनिवेशिक सत्ता का प्रतीक है, जिसकी रक्षा के लिए स्वतंत्र भारत के अधिकारी परेशान हैं।

इस प्रकार, लेखक ने 'नाक' जैसे साधारण शब्द का प्रयोग करके कहानी को कई गहरे अर्थ दिए हैं।

✅ Model Answer

इस बात से लेखक निम्नलिखित महत्वपूर्ण बातों की ओर संकेत करना चाहता है:

  • भारतीयों का आत्म-सम्मान: लेखक यह दर्शाना चाहता है कि भारत के स्वतंत्रता सेनानियों, नेताओं और यहाँ तक कि शहीद बच्चों का मान-सम्मान और त्याग किसी भी विदेशी शासक (जॉर्ज पंचम) से कहीं ज़्यादा बड़ा है। उनकी "नाक" यानी इज़्ज़त, जॉर्ज पंचम की "नाक" से ऊँची थी।
  • गुलामी के प्रतीकों का खंडन: जॉर्ज पंचम गुलामी का प्रतीक था, जबकि भारतीय नेता और शहीद बच्चे आज़ादी और बलिदान के प्रतीक हैं। लेखक स्पष्ट करते हैं कि आज़ादी के दीवानों का सम्मान किसी भी अत्याचारी शासक से बड़ा होता है।
  • राष्ट्रीय स्वाभिमान: लेखक का संकेत है कि हमें अपने नायकों पर गर्व होना चाहिए, न कि उन लोगों पर जिन्होंने हम पर शासन किया। भारतीय अधिकारियों का अपने देश के महापुरुषों का अपमान करके एक विदेशी की मूर्ति को तरजीह देना शर्मनाक है।

संक्षेप में, यह भारतीय गौरव, स्वाभिमान और बलिदान को विदेशी शासक की झूठी शान से कहीं ज़्यादा श्रेष्ठ बताने का एक सशक्त साहित्यिक प्रयास है।

✅ Model Answer

अखबारों ने ज़िंदा नाक लगने की खबर को बड़ी चालाकी और गोलमोल तरीके से प्रस्तुत किया। उन्होंने सच को सीधे-सीधे नहीं छापा, क्योंकि यह एक बहुत ही शर्मनाक और विवादास्पद घटना थी। उन्होंने खबर में सिर्फ इतना लिखा:

"जॉर्ज पंचम की नाक के लिए जो मसला था, वह हल हो गया है। राजपथ पर इंडिया गेट के पास वाली जॉर्ज पंचम की लाट के नाक लग गई है।"

इसके अलावा, अखबारों ने उस दिन की खबरों में कुछ और बातें भी छापीं जो इस शर्मनाक घटना पर उनका मौन विरोध दर्शाती थीं:

  • उस दिन देश में कहीं भी किसी उद्घाटन की खबर नहीं थी।
  • किसी ने कोई फीता नहीं काटा था।
  • कोई सार्वजनिक सभा नहीं हुई थी।
  • किसी का अभिनंदन या स्वागत नहीं हुआ था।
  • किसी को मानपत्र भेंट करने की नौबत नहीं आई थी।

इस तरह, अखबारों ने ना तो कोई खुशी मनाई और ना ही कोई जश्न। उनका यह मौन और खालीपन ज़िंदा नाक लगने की घटना पर पूरे राष्ट्र के दुख और शर्म को व्यक्त कर रहा था।

🚀Extra Important Questions (Board Style 2026-27)

📌 वस्तुनिष्ठ प्रश्न (MCQs)
Difficulty: Easy
Q1. "जॉर्ज पंचम की नाक" पाठ के लेखक कौन हैं?
✅ Correct: (ख) कमलेश्वर
Difficulty: Medium
Q2. रानी एलिजाबेथ के दौरे के समय अखबारों में किसकी खबरें छप रही थीं?
✅ Correct: (घ) उपरोक्त सभी
Difficulty: Medium
Q3. मूर्तिकार ने नाक की समस्या को हल करने के लिए सबसे पहला प्रयास क्या किया?
✅ Correct: (ग) मूर्ति जिस पत्थर से बनी थी उसे खोजना
Difficulty: Hard
Q4. "सबकी नाकें जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ी निकलीं।" - इस पंक्ति में 'बड़ी नाक' का क्या अर्थ है?
✅ Correct: (ग) अधिक मान-सम्मान
Difficulty: Easy
Q5. अंत में मूर्ति पर कौन-सी नाक लगाई गई?
✅ Correct: (घ) एक ज़िंदा नाक
📌 लघु उत्तरीय प्रश्न (Short Answer Questions)
✅ Model Answer

इस पंक्ति का आशय है कि रानी एलिजाबेथ के भारत दौरे की तैयारी की हलचल इंग्लैंड में शुरू हुई थी, लेकिन उसका प्रभाव और शोरगुल भारत में कहीं ज़्यादा था। भारतीय अधिकारी और मीडिया इंग्लैंड की हर छोटी-बड़ी खबर को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत कर रहे थे, जो उनकी गुलामी की मानसिकता को दर्शाता है।

✅ Model Answer

मूर्तिकार को 'कलाकार' इसलिए कहा गया क्योंकि वह अपनी कला में निपुण था, लेकिन उसे 'लाचार' इसलिए कहा गया क्योंकि वह पैसों के लिए विवश था। वह जानता था कि जो वह कर रहा है वह गलत है, फिर भी सरकारी तंत्र के दबाव और पैसों की मजबूरी के कारण वह अनैतिक सुझाव देने पर विवश हो गया।

✅ Model Answer

अंत में अखबार ज़िंदा नाक लगने की शर्मनाक घटना पर चुप हो गए। वे इस खबर को सीधे तौर पर छापकर देश के आत्म-सम्मान को और चोट नहीं पहुँचाना चाहते थे। उनका चुप रहना इस अमानवीय कृत्य के प्रति मौन विरोध, दुख और राष्ट्रीय शर्म को दर्शाता है।

✅ Model Answer

यह चित्र इंडिया गेट के पास स्थित उस छतरी (कैनोपी) की याद दिलाता है जहाँ कभी जॉर्ज पंचम की मूर्ति लगी थी। पाठ के अनुसार, रानी एलिजाबेथ के आगमन से पहले इस मूर्ति की नाक गायब हो गई थी। इस नाक को वापस लगाना भारतीय हुक्मरानों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया। उन्होंने अपनी गुलामी की मानसिकता के कारण एक ज़िंदा भारतीय की नाक काटकर इस बेजान मूर्ति पर लगा दी, जो राष्ट्रीय शर्म का प्रतीक बना।

✅ Model Answer

इस कथन द्वारा लेखक ने सरकारी व्यवस्था की अकर्मण्यता, लापरवाही और गैर-जिम्मेदाराना रवैये पर व्यंग्य किया है। सरकारी दफ्तरों में फाइलें एक विभाग से दूसरे विभाग घूमती रहती हैं, लेकिन कोई ठोस काम नहीं होता। महत्वपूर्ण जानकारियाँ और रिकॉर्ड फाइलों के ढेर में दबकर रह जाते हैं और समय पर कभी नहीं मिलते, जैसा कि मूर्ति के पत्थर की जानकारी के साथ हुआ।

📌 दीर्घ उत्तरीय/मूल्याधारित प्रश्न (Long Answer/Value-Based Questions)
✅ Model Answer

'जॉर्ज पंचम की नाक' कहानी के माध्यम से लेखक कमलेश्वर ने स्वतंत्र भारत की व्यवस्था पर कई गहरे व्यंग्य किए हैं:

  • औपनिवेशिक मानसिकता पर व्यंग्य: सबसे बड़ा व्यंग्य उन भारतीय अधिकारियों और नेताओं पर है जो आज़ादी के बाद भी अंग्रेज़ों की मानसिक गुलामी से मुक्त नहीं हो पाए हैं। वे एक विदेशी रानी को खुश करने के लिए अपने देश के सम्मान को भी दाँव पर लगा देते हैं।
  • नौकरशाही पर व्यंग्य: सरकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर तीखा प्रहार किया गया है। मीटिंग, एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालना, और समस्या का समाधान करने के बजाय उसे और उलझा देना - यह सब नौकरशाही की पोल खोलता है।
  • मीडिया की भूमिका पर व्यंग्य: लेखक ने मीडिया के सतहीपन पर भी व्यंग्य किया है। रानी के दौरे के समय अखबार ज़रूरी मुद्दों को छोड़कर उनके कुत्तों, बावर्ची और कपड़ों की खबरें छाप रहे थे।
  • राष्ट्रीय स्वाभिमान का अभाव: पूरी कहानी इस बात पर व्यंग्य है कि जिन अधिकारियों पर देश के स्वाभिमान की रक्षा का भार है, वे खुद ही स्वाभिमान-रहित हैं। उनके लिए एक मूर्ति की नाक बचाना, देश के किसी नागरिक की जान से ज़्यादा कीमती है।
✅ Model Answer

नहीं, मैं बिल्कुल नहीं मानता कि जॉर्ज पंचम की मूर्ति की नाक बचाने के लिए भारतीय अधिकारियों द्वारा किए गए प्रयास तर्कसंगत थे। वे पूरी तरह से अतार्किक, शर्मनाक और गुलामी की मानसिकता के परिचायक थे।

  • प्राथमिकताओं का अभाव: एक आज़ाद देश को अपने विकास, शिक्षा, और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए, न कि एक विदेशी शासक की मूर्ति पर।
  • अनैतिक कृत्य: अपने देश के महापुरुषों और शहीदों की नाक काटकर लगाने का विचार ही घोर अपमानजनक है। और अंत में एक ज़िंदा व्यक्ति की नाक लगाना तो अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
  • आत्म-सम्मान की कमी: यह दर्शाता है कि अधिकारियों में राष्ट्रीय स्वाभिमान की भारी कमी थी। वे अपनी इज़्ज़त को रानी की नज़रों में अच्छा दिखने से जोड़ रहे थे, न कि देश के गौरव से।

एक तर्कसंगत प्रयास यह होता कि उस मूर्ति को ही वहाँ से हटा दिया जाता, क्योंकि वह गुलामी का प्रतीक थी।

✅ Model Answer

पाठ में यह बात स्पष्ट रूप से सिद्ध होती है कि भारतीय शहीदों और नेताओं का सम्मान जॉर्ज पंचम से कहीं बढ़कर है। जब मूर्तिकार जॉर्ज पंचम की टूटी नाक के नाप की नाक खोजने के लिए पूरे देश में घूमता है, तो उसे एक विचित्र सत्य का पता चलता है।

  • वह दादाभाई नौरोजी, गोखले, तिलक, शिवाजी, गांधीजी, पटेल, आज़ाद, भगत सिंह जैसे सभी महान नेताओं की मूर्तियों को जाँचता है, लेकिन उन सबकी नाकें जॉर्ज पंचम की नाक से 'बड़ी' निकलती हैं।
  • यहाँ तक कि 1942 के आंदोलन में शहीद हुए छोटे-छोटे बच्चों की मूर्तियों की नाकें भी जॉर्ज पंचम की नाक से बड़ी थीं।

'नाक का बड़ा होना' यहाँ उनके मान-सम्मान, त्याग, बलिदान और देश के प्रति योगदान का प्रतीक है। लेखक यह स्थापित करता है कि इन भारतीय नायकों का कद इतना ऊँचा है कि उनके सामने जॉर्ज पंचम जैसा विदेशी शासक बौना नज़र आता है। इस तरह, लेखक ने बड़ी चतुराई से भारतीय स्वाभिमान को विदेशी गुलामी के प्रतीक से श्रेष्ठ बताया है।

✅ Model Answer

शीर्षक: "आज़ाद भारत में गुलामी की नाक: क्या एक ज़िंदा नाक से बच गई देश की इज़्ज़त?"

रिपोर्ट:

नई दिल्ली: आज राजपथ पर एक अभूतपूर्व और शर्मसार कर देने वाली घटना घटी। रानी एलिजाबेथ के आगमन से पूर्व, जॉर्ज पंचम की खंडित मूर्ति को 'पूर्ण' करने के लिए उस पर एक ज़िंदा नाक लगा दी गई। यह किसकी नाक है, यह तो कोई नहीं जानता, पर यह निश्चित रूप से उस भारत की नाक नहीं है जिसने आज़ादी के लिए कुर्बानियाँ दी थीं।

हमारे हुक्मरान, जो एक विदेशी शासक की मूर्ति की नाक बचाने के लिए इतने व्याकुल थे, यह भूल गए कि देश की असली नाक उसके करोड़ों नागरिकों का आत्म-सम्मान है। आज जब मूर्ति पर एक असली नाक लगी है, तब पूरा देश मौन है। कोई जश्न नहीं, कोई उत्सव नहीं। यह मौन इस बात का गवाह है कि आज एक मूर्ति को सजाने के लिए हमने अपनी आत्मा का एक टुकड़ा खो दिया है। क्या यही है वह 'कायापलट' जिसका हम दावा कर रहे थे? यह सवाल आज हर भारतीय के मन में कौंध रहा है।

✅ Model Answer

'नाक मान-सम्मान व प्रतिष्ठा का द्योतक है', यह बात इस पूरी रचना का केंद्रीय भाव है और यह कई स्तरों पर उभरकर आती है:

  1. सरकारी तंत्र की नाक: अधिकारियों के लिए जॉर्ज पंचम की नाक उनकी अपनी नाक थी। उन्हें डर था कि अगर रानी ने टूटी नाक वाली मूर्ति देख ली तो उनकी 'नाक कट जाएगी' यानी उनकी बेइज़्ज़ती होगी।
  2. रानी की नाक: रानी के भारत आगमन को ब्रिटिश साम्राज्य की नाक (इज़्ज़त) से जोड़ा गया था।
  3. भारतीय नायकों की नाक: जब मूर्तिकार भारतीय नेताओं की मूर्तियों की नाक नापता है, तो वे सब 'बड़ी' निकलती हैं। यह उनके ऊँचे सम्मान और प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
  4. देश की नाक: अंत में, एक ज़िंदा नाक लगाकर अधिकारियों ने भले ही अपनी नाक बचा ली हो, लेकिन उन्होंने पूरे देश की नाक (आत्म-सम्मान) कटवा दी।

इस प्रकार, लेखक ने नाक को प्रतीक बनाकर पूरी कहानी में मान-सम्मान, प्रतिष्ठा, चापलूसी और राष्ट्रीय स्वाभिमान के बीच के संघर्ष को दर्शाया है।

Common Mistakes to Avoid

01
🔄
Ignoring the Satire
Students often read it as a simple story, missing the deep satire. Remember to mention terms like 'व्यंग्य' and 'गुलामी की मानसिकता' in your answers.
02
🔍
Literal Interpretation
Don't take "नाक" literally. It's a symbol of honor and prestige. Your answers should reflect this symbolic meaning.
03
💬
Just Summarizing the Plot
In long answers, avoid just retelling the story. Analyze the events and explain what the author is trying to criticize through them.
04
📍
Forgetting Key Quotes
Quotes like "शंख इंग्लैंड में बज रहा था..." or "फाइलें सब कुछ हज़म कर चुकी हैं" add weight to your answers. Try to remember a few.

📚Exam Preparation Tips for 2026-27

01
📈
Mind Map the Story
Create a mind map connecting the key characters (Queen, officials, sculptor) and events (nose disappears, search for nose, living nose is fixed).
02
📋
Focus on the Theme
Understand the central theme: the clash between colonial sycophancy and national pride. Every answer should connect back to this theme.
03
💡
Symbolism is Key
Pay special attention to the symbolism of the "nose." It's the heart of the chapter. Use it in your answers to show deeper understanding.
04
Practice Writing
Kritika questions are often value-based and require you to express your opinion. Practice writing answers in your own words.

🅾Frequently Asked Questions (FAQs)

What is the main message of 'George Pancham Ki Naak'?
The main message is a sharp critique of the colonial mindset that persisted in India even after independence. It mocks the bureaucracy and leaders who prioritize pleasing foreign dignitaries over national self-respect.
Why was everyone so worried about a statue's nose?
The officials were worried because they saw the statue's nose as a symbol of their own honor and the nation's prestige in front of Queen Elizabeth. They feared that a broken statue would show India in a poor light.
Is 'George Pancham Ki Naak' a true story?
No, it is not a true story. It is a work of fiction and satire written by Kamleshwar to comment on the political and social state of post-independence India.
What does the 'nose' symbolize in the chapter?
The 'nose' (नाक) is a powerful symbol of honor, prestige, and respect. A 'cut nose' (नाक कटना) signifies a loss of honor. The entire story revolves around this symbolism.

Master जॉर्ज पंचम की नाक 🌍

"जॉर्ज पंचम की नाक" is more than just a chapter; it's a lesson in national pride and self-respect. By understanding its satirical tone and symbolic meaning, you can not only score full marks but also become a more aware citizen.

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